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50 लाख से ज्यादा जन संख्या वाली जातियां

2017-08-15 14:57:57
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हान जाति

चीन की 56 जातियों में हान जाति की जन संख्या सब से ज्यादा है और वर्तमान विश्व में उस की जन संख्या भी सब से ज्यादा है । अब हान जाति की जन संख्या 1 अरब 20 करोड़ है । हान जाति प्राचीन काल में मध्य चीन में रहने वाले "ह्वा शा"नामक निवासियों की संतान है , जिस का इतिहास अब तक 5 हज़ार वर्ष लम्बा पुराना है । कालंतर में "ह्वा शा" निवासियों में देश की अन्य कुछ जातियों का विलय हुआ और हान जाति की उत्पति हुई । हान राजवंश से हान जाति का नाम अस्तित्व में आया । हान जाति की अपनी भाषा-- हान भाषा सृजित हुई है । हान जाति की भषा हान-तिब्बती भाषा श्रेणी का एक भाग है । उस में उत्तर चीन की बोली , वू बोली, श्यांग बोली, गान बोली, खचा बोली, दक्षिणी मिन बोली, उत्तरी मिन बोली तथा य्वे बोली (कंतनिस) शामिल हैं , हान जाति की साझा भाषा फुथोंह्वा अर्थात मानक चीनी भाषा होती है । हान लिपी विश्व में सब से पुरानी लिपियों में से एक है । प्राचीनतम चीनी लिपी पशु की हड्डियों व कच्छ खोलों पर खुदे और कांस्य बर्तनों पर खुदे चित्र रूपी अक्षरों के रूप में मिलती है , उन का रूपांतर व विकास हो कर आज की जैसी चतुर्कोणी अक्षरों वाली लिपी बन गयी , हान भाषा में कुल 80 हज़ार अक्षर होते हैं , जिन में से 7 हज़ार ज्यादातर प्रयोग किये जाते हैं । अब हान भाषा अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में प्रचलित भाषाओं में से एक बन गई है । हान जाति के लोग मुख्य तौर पर अनाज के खाद्यपदार्थ खाते हैं, और साथ ही पशुओं के मांस और साग सब्ज़ियां भी खाते हैं । अपनी जाति के लम्बे समय के विकास के दौरान हान जातियों को दिन में तीन वक्त भोजन करने की आदत पड़ी है । चावल और आटा की रोटी हान जाति के मुख्य खाद्य पदार्थ है । इस के अलावा हान जाति के लोग मकई , बाजरा , जौ और शकरगंठ जैसे अन्न भी खाते हैं ।चीन के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की स्थिति के कारण हान जाति के लोगों में भिन्न भिन्न किस्मों भोजन पद्धतियां संपन्न हुई है । अब चीन में हान जाति और अन्य जातियों के आहार के स्वाद दक्षिण चीन में मीठा , उत्तर में नमकन , पूर्व में गर्म तेज और पश्चिम में खट्टा होते हैं । चीन में हू नान प्रांत ,सछ्वान प्रांत, उत्तर पूर्वी चीन तथा क्वांगतुंग प्रांत की भोजन प्रणाली समेत आठ प्रमुख किस्मों की भोजन प्रणाली बहुत प्रसिद्ध है । मदिरा और चाय हान जाति के प्रमुख पेयजल हैं । चीन चाय की उत्पति भूमि माना जाता है , और विश्व में शराब बनाने की तकनीक प्राप्त प्राचीनतम देशों में से एक भी है । चीन में मदिरा संस्कृति और चाय संस्कृति का इतिहास बहुत पुराना है । इन दो किस्मों के पेयजल के अलावा, अन्य फलों से बने पेयजल भी विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न किस्मों के रूप में लोकप्रिय है । हान जाति के त्यौहार बहुत ज्यादा है , और वसंत त्यौहार सब से महत्वपूर्ण परम्परागत त्यौहार माना जाता है । इस के अलावा, चीनी पंचांग के अनुसार हर वर्ष के पहले माह की पंद्रहवीं तारीख को य्वानश्याओ उत्सव ,पांचवें माह की पांचवीं तारीख का त्वान वु उत्सव तथा आठवें माह की पंद्रहवीं तारीख को मध्य शरद उत्सव आदि की खुशियां मनाई जाती हैं ।

ज्वांग जाति

चीन की अल्पसंख्यक जातियों में ज्वांग जाति की जन संख्या सब से ज्यादा है , ज्वांग जाति के लोग मुख्य तौर पर दक्षिणी चीन के क्वांगशी ज्वांग जातीय स्वायत्त प्रदेश में रहते हैं । ज्वांग जाति की भाषा हान-तिब्बती भाषा श्रेणी में शामिल होती है । चीन के दिक्षण भाग में बसी ज्वांग जाति का इतिहास बहुत पुराना है । दसियों हज़ार वर्ष पहले ज्वांगग जाति के पूर्वज दक्षिणी चीन में रहते थे । वर्ष 1958 में क्वांगशी ज्वांग जातीय स्वायत्त प्रदेश की स्थापना हुई । ज्वांग जाति कृषि प्रधान जाति है ,जो मुख्यतः धान और मकई का उत्पादन करती है । ज्वांग जाति के लोग गीत गाने के शौकिन हैं , इसलिए ज्वांग जातीय क्षेत्र को गीतों का सागर माना जाता है । ज्वांग जाति की परम्परागत शिल्पकला कृति ज्वांग चिन यानी ज्वांग जाति का रेशमी बुनाई की चीजें बहुत सुन्दर व चमकीली होती हैं । पुराने जमाने में ज्वांग जाति प्रकृति व बहुदेवता में आस्था रखती थी । थांग और सुंग राजवंशों के बाद बौद्ध धर्म और ताओ धर्म क्रमशः ज्वांग जातीय क्षेत्र में प्रचलित हो गए , आधूनिक समय में इसाई और केथोलिक आदि पश्चिमी धर्म भी ज्वाग जातीय क्षेत्र में स्वीकृत हो गए , लेकिन उन का प्रभाव कम होता है ।

मान जाति

मान जाति के लोग अब चीन भर में फैले हुए हैं , उन में से उत्तर पूर्व चीन के ल्याओनिन प्रांत में रहने वाली मान जाति की जन संख्या सब से ज्यादा है । मान जाति के लोग मान भाषा का प्रयोग करते हैं , जो अर्ताई भाषा व्यवस्था के तहत होती है । हान जाति के साथ रहने और घनिष्ठ संपर्क होने के कारण अब मान जाति के लोग आम तौर पर हान भाषा का प्रयोग करते हैं , सिर्फ़ दूर दराज कुछ गांवों में कुछ वृद्ध लोग मान-भाषा बोल सकते हैं । मान जाति ने बहुदेव धर्म-- सामान धर्म में विश्वास किया था । मान जाति का इतिहास कोई 2000 वर्ष पुराना है । लम्बे अरसे में मान जाति के लोग उत्तर पूर्वी चीन के छांगपाइ पर्वत के उत्तर में स्थित हेलुंगच्यांग नदी के मध्य व निचले भाग तथा उसुरी नदी के विशाल घाटी क्षेत्र में रहती थी । 12वीं शताब्दी में तत्कालीन न्युजन नामक मान जाति के लोगों ने चिन राजवंश की स्थापना की । वर्ष 1583 में नुरहाछी ने न्युजन के विभिन्न कबीलाओं का एकीकरण किया और आठ लीग वाली शासन व्यवस्था की स्थापना की और मान भाषा का सृजन किया । वर्ष 1635 में नुरहाछी ने जाति का नाम बदल कर मांचूरी रखा , 1636 में वे राजा की गद्दी पर बैठा और उस के देहांत के बाद उस के पुत्र ने राजवंश का नाम बदल कर छिंग रखा । वर्ष 1644 में छिंग राजवंश की सेना ने उत्तर पूर्वी चीन से मध्य चीन में प्रवेश किया और चीन के अंतिम सामंती राजवंश की स्थापना की । वर्ष 1911 में हुई क्रांति से छिंगराजवंश का पतन हुआ , इस के बाद इस जाति का नाम औपचारिक रूप से मान जाति पड़ा । मान जाति के लोगों ने चीन के एकिकरण , प्रादेशिक भूमि के विस्तार , आर्थिक व सांस्कृतिक विकास के लिए भारी योगदान किया था ।

( चित्रः मान जाति के परम्परागत वस्त्र )

ह्वी जाति

ह्वी जाति की जन संख्या 98 लाख से ज्यादा है , जो मुख्यतः उत्तर पश्चिमी चीन के निंगशा ह्वी जातीय स्वायत्त प्रदेश में रहती है । चीन के अन्य क्षेत्रों में भी ह्वी जाति के लोग बसे हुए हैं । कहा जा सकता है कि देश भर में ह्वी जाति के लोग फैले हुए हैं और चीन में सब से अधिक क्षेत्रों में फैली हुई अल्पसंख्यक जाति मानी जाती है । लम्बे अरसे में हान जाति के साथ रहने के कारण ह्वी जाति मुख्य तौर पर हान भाषा का प्रोयग करती है और अन्य अल्पसंख्यक जाति बहुल क्षेत्रों में रहने वाले ह्वी जाति के लोग उन अल्पसंख्यक जातियों की भाषा भी बोलते हैं ह्वी जाति के कुछ लोगों को अरबी व फ़ारसी भाषा भी आती हैं । ह्वी जाति का इतिहास 7वीं शताब्दी से शुरू हुआ । उसी समय अरबी व फ़ारसी व्यपारी चीन में आये, वे मुख्यतः दक्षिण पूर्वी चीन के क्वांगचो और छ्वानचो आदि क्षेत्रों में बसे थे । कोई सैकड़ों वर्षों के विकास के बाद ह्वी जाति की उत्पति हुई बन । इस के अलावा 13वीं शताब्दी के शुरू में युद्ध की विपत्ति से बचने के लिए मध्य एशिया , फ़ारस तथा अरब क्षेत्र के बहुत से लोग भाग कर चीन के उत्तर पश्चिमी भाग में आ बसे । ये लोग विवाह और धर्म के माध्यम से चीन के हान जाति , उइगुर जाति तथा मंगोल जाति के लोगों के साथ विलय हुए धीरे धीरे एक नयी जाति--ह्वी जाति के रूप में विकसित हो गए । ह्वी जाति के लोग इस्लाम धर्म के अनुयायी हैं , उन्होंने शहरों, कस्बों, यहां तक गांवों में भी मस्जिद की स्थापना की , और मस्जिद के आसपास रहने की विशेष आबादी बन गयी । ह्वी जाति को खाने पीने की अपनी विशेष आदत होती है । ह्वी जातीय रेस्टरां व खाद्यपदार्थ दुकानों के दरवाज़ों पर अपनी जाति के विशेष चिह्न मुस्लिम दुकान जैसा अक्षर या चित्र अंकित होता है , इन रेस्टरां और दुकान मुख्य तौर पर ह्वी जाति के लोगोंं को सेवा प्रदान करते हैं । ह्वी जाति का उच्च आर्थिक व सांस्कृतिक स्तर होता है , और उस ने चीनी इतिहास के विकास के लिए महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है ।

( चित्रः ह्वी जाति के लोग ईद उत्सव की खुशी मनाते हुए )

म्याओ जाति

म्याओ जाति की जन संख्या लगभग 89 लाख 40 हज़ार है , जो मुख्य तौर पर चीन के क्वोचो, युन्नान, सछ्वान, क्वांग शी, हुनान, हुपेई और क्वांगतुंग आदि प्रांतों में बसती है । म्याओ जाति अपनी म्याओ भाषा का प्रयोग करती है , म्याओ भाषा हान-तिब्बती भाषा श्रेणी का एक अंग है । अतीत में म्याओ जाति की अपनी एकीकृत लिपी नहीं थी । वर्ष 1956 में म्याओ जाति ने अपनी चार बोलियों के आधार पर लाटिन अक्षरों की अपनी लिपी बनायी , तभी से इस जाति की अपनी लिपी बन गई है । म्याओ जाति चीन में पुराने इतिहास वाली जातियों में से एक है । चार हज़ार वर्ष पूर्व के ऐतिहासिक ग्रंथों में इस जाति का उल्लेख उपलब्ध है । किवदंती में चीनी राष्ट्र के पूर्वज ह्वांगती और यानती के साथ कभी लड़ने और कभी सहयोग करने वाले छीयो नामक कबीलाई राजा म्याओ जाति के पूर्वक माना जाता है । युद्ध , प्राकृतिक विपत्ति, रोग आदि के कारण म्याओ जाति निरंतर अपने जान्मस्थल से स्थानांतरित हुआ करती थी , इस से म्याओ जाति के लोग व्यापक क्षेत्रों में बस गए और भिन्न भिन्न स्थानों की म्याओ जाति की शाखाओं में भिन्न भिन्न बोलियां, वस्त्र तथा रीति-रिवाज़ उत्पन्न हुई हैं । विभिन्न क्षेत्रों में फैली हुई म्याओ जाति अपने अपने विशेष नाम से भी संबोधित होती है । उदाहरण के लिए नाना प्रकार के वस्त्र पहनने की वजह से उन्हें बड़ी स्कर्ट वाली म्याओ जाति, छोटी स्कर्ट वाली म्याओ जाति, लाल रंग वाली म्या जाति और काला रंग वाली म्याओ जाति संबोधित किया जाता ह । म्याओ जाति मुख्य तौर पर आदि धर्म में विश्वास करती है और धान मकई , तिलहन , और चीनी जड़ी बुटियों की खेती करती है ।

( चित्रः म्याओ जाति के परम्परागत वस्त्र )

यी जाति

यी जाति की जन संख्या 77 लाख से ज्यादा है, जो मुख्यतः चीन के युन्नान, सछ्वान, क्वोचो और क्वांगशी आदि चार प्रांतों में बसी है । यी जाति अपनी भाषी बोलती है । यी भाषा हान तिब्बती भाषा व्यवस्था का एक अंग है । हान जाति के लोगों के साथ ज्यादा संपर्क करने वाले यी जातीय लोगों को हान भाषा भी आती है । यी जाति चीन में जन संख्या ज्यादा, आबाद क्षेत्रों के अधिक और लम्बा पुराना इतिहास होने वाली जातियों में से एक है । दो हज़ार वर्ष पहले उत्तर चीन से आई तीछ्यांग जाति के लोगों और दक्षिण में रहने वाले स्थानीय लोगों के साथ विलय हुआ, जिस से एक नयी जाति--यी जाति उत्पन्न हुई । यी जाति की एक विशेषता है कि लम्बे समय तक यी जाति में दास व्यवस्था लागू होती थी । वर्ष 1949 में नये चीन की स्थापना के बाद यी जातीय क्षेत्र में लोकतांत्रिक सुधार किया गया , और तभी से वहां की दास व्यवस्था को समाप्त किया गया । पुराने समय में यी जाति बहुदेव धर्म को मानती थी और छिंग राजवंश में ताओ धर्म यी जाति में लोकप्रिय हुआ । 19वीं शताब्दी के अंत में कैथोलिक व क्रिश्चिन धर्म भी यी जाति में प्रवेश कर गए , लेकिन इन के अनुयायी कम हैं ।

( चित्रःयी जाति की सुन्दर थैली )

मंगोल जाति

मंगोल जाति की जन संख्या 58 लाख है और वह मुख्या तौर पर चीन के भीतरी मंगोलिया स्वायत्त प्रदेश और शिन्च्यांग उईगुर स्यावात्त प्रदेश, छिंगहाई, कानसू, हेलुंगच्यांग, चीलिन, तथा ल्याओनिंग आदि प्रांतों के मंगोलिया जातीय स्वायत्त प्रिफैक्चरों व कांऊटियों में बसी है । मंगोल जाति मंगोली भाषा का प्रयोग करती है , यह भाषा आर्ताई भाषा व्यवस्था का एक अंग है । मंगोल का नाम सब से पहले थांग राजवंश में अस्तित्व में आया , उसी समय यह सिर्फ़ मंगोल के विभिन्न कबीलों में से एक का नाम था । मंगोल कबीले का जन्म स्थ��� अर्गुना नदी के पूर्वी भाग में था और धीरे धीरे पश्चिमी ओर आ बसा । विभिन्न कबीलों के बीच श्रम शक्तियों, पशुओं तथा संपत्ति की छिनाझपटी के लिए लड़ाई हुआ करती थी । वर्ष 1206 में तामूचन को मंगोल का राजा खां बनाया गया , जो चंगेज खान के नाम से विश्वविख्यात रहा ,उस ने मंगोल राज्य की स्थापना की । इसतरह उत्तर चीन में पहली बार एक शक्तिशाली, स्थिर व विकसित जाति--मंगोल जाति पैदा हुई । बाद में चंगेज खान ने मंगोल के विभिन्न कबीलों, यहां तक की चीन का एकिकरण किया और उस के पोता खुबले खान ने चीन के य्वान राजवंश की स्थापना की । मंगोल जाति आम तौर पर लामा धर्म में विश्वास करती है । मंगोल जाति ने चीन के राजनीतिक, सैनिक, आर्थिक, वैज्ञानिक व तकनीक विकास , खगोल शास्त्र , कला साहित्य व सांसकृतिक, चिकित्सक प्रगति में भारी योगदान किया है ।

( चित्रः मंगोल जाति की वास्तु कला --- मंगोली तंबू )

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