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राजा कसार की जीवनी

2017-08-15 17:05:20
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राजा कसार की जीवनी विश्व का ऐसा एकमात्र प्राचीनतम महा काव्य है कि वह आज भी चीन के तिब्बत ,भीतरी मंगोलिया स्वायत्त प्रदेशों व छिंग हाइ प्रांत में सौ से ज्यादा लोक कलाकार महाराजा कसार के महान कार्यों के वाचन में लगे हुए हैं ।

राजा कसार की जीवनी ईसापूर्व दूसरी तीसरी सदी से ईसा छठी सदी के बीच लोक वाचकों के हजार वर्ष लम्बे समय के प्रयासों से संपन्न हुई थी । इस के कालांतर में जीवनी की कथावस्तु व भाषा भी संवर , अलंकृत और समृद्ध होती गई । 12वीं सदी के शुरू तक राजा कसार की जीवनी परिपक्कव हो गई ,जो व्यापक तिब्बती क्षेत्रों में प्रचलित रही ।

राजा कसार की जीवनी में यह कहानी है कि बहुत प्राचीन समय में चीन के तिब्बती क्षेत्र में प्राकृतिक विपदा निरंतर पैदा होता था और दानव व भूत तबाही मचाते थे । तिब्बती जनता दुखद जीवन बिताते थे । लोगों को मुसिबतों के सागर से उबारने के लिए बौधित्सव अवलोकनतेश्वर ने बुद्ध अमिताभ से स्वर्ग देवता का पुत्र धरती पर भेजने की मांग की । स्वर्ग देवता के पुत्र थ्वी पाकवा स्वेच्छे से तिबब्ती राजा कसार के रूप में अवतारित हो गया , वह देवता और मानव दोनों रूप में जन्मा था और उसे दिव्य शक्ति प्राप्त हुई थी । पैदा होने के बाद ही कसार ने दानवों व भूतों का विनाश करने का काम शुरू किया । 12 वर्ष की आयु में कसार एक घुड़सवारी दौड जीत कर तिब्बती क्षेत्र का राजा बन गया ।इस के बाद कसार ने अपनी असाधारण क्षमता दिखाते हुए तिब्बत में अजेय फतह चलाते हुए सभी किस्मों के दानवों व भूतों पर विजय पाया । अपना पवित्र कर्तव्य पूरा करने के बाद कसार मानव जगत से फिर स्वर्ग में वापस लौटा ।

महाकाव्य कसार की जीवनी में कविता की 10 लाख से ज्यादा पंक्तियां हैं और 200 लाख से अधिक शब्द ,जो विश्व में सब से लंबा महाकाव्य हैं ।

राजा कसार की जीवनी की बहुत सी विषयवस्तुएं लोकगीतों ,दंतकथाओं और पौराणिक कथाओं से आयी थी । कहानी में कई सौ सजीव पात्र रचे गये थे , जिन में वीर हो या क्रूर शासक , पुरूष हो या नारी और युवा हो या वृद्ध सभी सजीव चित्रित हुए थे । कहानी की एक बड़ी विशेषता बड़ी संख्या में तिब्बती कहावतों का हवाला लिया गया । वह चीन की मूल्यवान सांस्कृतिक खजाना है । चीन सरकार राजा कसार की जीवनी के अध्ययन ,अनुवाद व प्रकाशन पर बडा ध्यान देती आयी है ।वर्ष 2002 में राजा कसार की जीवनी की सहस्त्राब्ती वर्षगांठ के उपलक्ष्य में सिलसिलेवार गतिविधियां आयोजित कीं ।अब चीन के दस से अधिक विश्वविद्यालयों व अनुसंधान संस्थाओं में कार्यरत अनेक विद्वान इस महाकाव्य पर अनुसंधान कर रहे हैं ।

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