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सुरज को मार गिराने की कहानी

2017-08-15 17:14:00
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प्राचीन काल में आसमान में दस सुर्य उत्पन्न हुए , उन की जबरदस्त रोशनी से जमीन सूख पड़ी , फसल जल कर नष्ट हुई और मनुष्य तपती हुई गर्मी से मुर्च्छित हुए दम तोड़ रहे । तपती हुई जल वायु में कुछ शैतान और राक्षस सूखी नदियों , झीलों और जंगलों से बाहर निकल कर नरसंहार मचा रहे थे ।

मनुष्य पर पड़े संकट से स्वर्ग सम्राट को भी सदमा लगा , उस ने धनु देवता की संतान हो-ई को धरती पर मनुष्ट को संकट से उद्धारने के लिए भेजा । हो-ई स्वर्ग सम्राट द्वारा भेंट में दिए लाल रंग का धनु और सफेद रंग के बाण ले कर अपनी लावण पत्नी छांग-अ के साथ जग लोक में उतर आए ।

धरती पर उतर आने के बाद हो-ई ने दस सुर्यों को यह सलाह दी कि रोज उन में से एक आसमान में घूमने आए , जिस से धरती को गर्मी व मनुष्य को रोशनी भी मिली , जमीन तेज किरणों से तपती सूख होने से भी बच सके । लेकिन सुरजों ने हो-ई की सलाह नहीं मानी । सुरजों की हठधर्मी से क्रुद्ध हो कर हो-ई ने सुरजों को मार गिराने की ठान ली । उस ने कंधे पर से लाल धनु उतारा और म्यान से सफेद बाण बाहर निकाला और घमंड से अंधे हुए सुर्यों को मार गिराने के लिए छोड़ा , देखते ही देखते नौ सुरज मार गिराए गए , आसमान में मात्र एक सुर्य रह गया , तब से धरती शांत हो गई , मनुष्य पुनः शांति चैन जीवन बिताने लगे, वे हो-ई के बहुत आभारी थे ।

इस महान कारनाम के कारण हो-ई अन्य स्वर्ग देवतों के ईर्षा के निशाना बन गया , उन्हों ने स्वर्ग सम्राट के सामने उस की खरीबुरी कह कर झूठा आरोप लगाया , जिस से सम्राट हो-ई से रूष्ठ हो गया । स्वर्ग सम्राट ने हो-ई और उस की पत्नी छांग-अ को देव लोक से बहिष्कृत कर जग लोक में भेजा और दोनों को फिर स्वर्ग लोक वापस आने की इजाजत नहीं दी । गलत सजा से दुख हरास हो कर हो-ई और छांग -अ धरती में उतर कर असली नाम छिपा कर प्रजा के भीतर बस गए , वे आखेट का जीवन बिताने लगे और जीवन बहुत दुभर रहा ।

समय तेजी से गुजरा , यह विचार लगातार हो-ई को सताता रहा कि उसी के कारण उस की पत्नी छांग-अ को भी स्वर्ग में वापस नहीं जा सकी । उस ने सुना कि खुनलुन पर्वत पर रहने वाले देवता सीवांगमु के पास दिव्य दवा है ,जिसे खाने के बाद मनुष्य स्वर्ग पर आरोहित हो सकता है । तो हो-ई लम्बी सफर तय कर लाखों मुसिबतों को सह कर खुनलुन जा पहुंचा , और सीवांगमु से दिव्य दवा मांगा । लेकिन यह दवा केवल एक व्यक्ति के लिए पर्याप्त थी , हो-ई का जी नहीं चाहता था कि अपनी प्यारी पत्नी को जग में छोड़ कर वह अकेला स्वर्ग जाए , लेकिन यह भी नहीं मानता था कि पत्नी उसे छोड़ कर अकेली स्वर्ग जाए । इस दुविधा से परेशान वह घर लौटा और दवा को छिपा कर गुप्त रखा ।

छांग -अ कठोर और गरीब जीवन से दुखी थी , एक दिन जब हो-ई घर पर नहीं था , तो उस ने दिव्य दला की तलाश कर अकेले खाया , तुरंत उस का शरीर उत्तरोतर हल्का होता गया और धीरे धीरे वह आकाश की ओर उड़ने लगी , उड़ती उड़ती अंत में वह चांद पर जा पहुंची और वहां के शीत महल में रहने लगी । जब पता चला कि पत्नी स्वर्ग लोक चली गई , तो हो-ई को बड़ा गम हुआ , वह दिव्य बाण से पत्नी को मार गिराने को कतई तैयार नहीं था , इस तरह दोनों सदा के लिए जुदा हो गए ।

अब हो-ई अकेलेपन का जीवन बिताने लगा , वह शिकारी के जीवन पर आश्रित रहा , उस ने कई शिष्यों को स्वीकार कर उन्हें तीर मारने का कौशल सीखाया । शिष्यों में से फङमन नाम का एक व्यक्ति था , वह होशियार था , अल्पकाल में ही उस ने तीरंदाजी के बेहतरीन कौशल पर अधिकार किया । लेकिन इस शिष्य के मन में एक दुष्ट विचार आया था कि जब तक हो-ई रहेगा , तब तक वह खुद तीरंदाजी के नम्बर एक पर नहीं आ सकेगा , एक दिन जब शराब पी कर हो-ई गहरी नींद में सोया , तो फङमन ने उसकी तीर मार कर हत्या की ।

छांग-अ चांद पर तो आरोहित हुई थी , लेकिन वहां निर्जन महल में केवल एक खरगोश और एक बुढ़ा थे , जो महज औषधि बनाना तथा वृक्ष काटना जानते थे । छांग-अ को अपने पती के साथ सुन्दर दिन और जग लोक के स्नेह की याद आई , तो उसे और अधिक अकेलेपन और उदासी महसूस हुई ,इसलिए वह रोज अपने को चांद के महल में बन्द करती रही ।

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