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सात राजाओं के विद्रोह का दमन

2017-08-15 17:24:00
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ईसापूर्व दूसरी शताब्दी में चीन में हान राजवंश की स्थापना हुई , हान राजवंश और उस के पश्चिम में बसी हूण जाति के बीच विवाह का रिश्ता कायम होने के जरिए शांति की स्थिति बनाए रखी हुई थी और दोनों में बड़े पैमाने वाला युद्ध नहीं छिड़ा । लेकिन बाद में हूण के राजा छानयु ने दूसरों के उकसावे में आकर हान राजवंश के साथ अच्छा रिश्ता तोड़ा । ईसापूर्व 158 में हूण ने हान राजवंश के सीमांत क्षेत्र पर हमला बोल कर लूट मार मचाया । सीमा से दुश्मन के आक्रमण की खबर पा कर हान राजवंश के सम्राट हान वुनती ने तीन सेनापतियों को सेना की तीन टुकड़ियों को ले ���र दुश्मन का मुकाबला करने भेजा और राजधानी छांगआन की रक्षा के लिए शहर के निकट दूसरे तीन सेनापतियों को नियुक्त किया , जिन में से सेनापति ल्यू ली बाशान नाम के स्थान , सेनापति श्युलि चीमन नाम के स्थान तथा सेनापति चोयाफु शिल्यो नाम के स्थान पर तैनात थे ।

एक दिन , हानवुनती इन सेनाओं का अभिनंदन करने के दौरान खुद सैनिक शिविरों का निरीक्षण दौरा करने गया। बाशान पर तैनात ल्यूली के सैन्य शिविर में सभी सैन्य अफसरों और सैनिकों ने बाहर निकल कर हानवुनती के स्वागत में एक भव्य रस्म का आयोजन किया । जब सम्राट हान वुनती का काफिला बिना पूर्व सूचना दिए सैन्य शिविर के भीतर प्रवेश कर रहा था , तो उस से पूछताछ और उसे रोकने के लिए किसी ने प्रयास नहीं किया । सम्राट हानवुनती के अभिनंदन कार्य की समाप्ति के बाद सेना के अफसरों और सैनिकों ने उसे बिदा देने का जोशीला रस्म आयोजित किया । बाशान से हानवुनती चीमन के श्युलि के सैन्य शिविर गया , वहां पर भी उसे बानशान का जैसा धुमधाम से स्वागत मिला । अंत में सम्राट हानवुती का काफिला चोयाफु के शिल्यो सैन्य शिविर की ओर रवाना हो गया । दूर से एक काफिला नजदीक आते देख कर चोयाफु की सेना के पहरेदार सैनिकों ने तुरंत सेनापति चोयाफु को सूचना भेजी , सैन्य शिविर में सभी अफसर और सिपाही तीर धनुष और तलवार तैयार कर लड़ाई के लिए मुस्तैद हो गए । जब हानवुन का अग्रिम दल शिविर के दरवाजे पर जा पहुंचा , तो शिविर को पहरी देने वाले सैनिकों ने तुरंत आगे बढ़ कर उसे रोका और अन्दर प्रवेश करने की इजाजत नहीं दी । सम्राट के अग्रिम दल के अधिकारी ने बड़ा रोब दिखा कर कहाः सम्राट आ पहुंचे हैं । लेकिन पहरेदार सैन्य अफसर ने दृढ़ भाव में कहाः सैन्य शिविर में केवल सेनापति की हुक्म बजती है । बिना सेनापति के आदेश की स्थिति में आप लोग अन्दर नहीं आ सकते । इस तरह सैनिकों और दरबारी अधिकारियों के बीच तीव्र वादविवाद हुआ । इसी बीच सम्राट हानवुनती की गाड़ी भी दरवाजे पर आ पहुंची , सैना ने फिर उसे भी रोक दिया । लाचार हो कर हानवुनती ने अपने आदमी को स्रमाट सूचक मुहर ले कर चोयाफु को यह सूचना भेजी कि सम्राट खुद सैन्य शिविर का अभिनंदन दौरा करने आये हैं । सूचना पा कर सेनापति चोयाफू ने शिविर का दरवाजा खोल कर हानवुनती के काफिले को अन्दर आने दिया । सैन्य शिविर के अफसर ने सम्राट के लोगों को यह भी बताया कि सैन्य नियम के मुताबिक शिविर के भीतर गाड़ी को तेज गति से दौड़ने की मनाही है । दरबारी अधिकारियों को सुन कर बड़ा गुस्सा आया , किन्तु सम्राट हानवुनती ने अपने काफिले को धीमी गति से आगे चले जाने का आदेश दिया ।

सेना के मुख्यालय के आगे सेनापति चोयाफु सैनिक वर्दी में तलवार लिए सम्राट के स्वागत में खड़ा नजर आया और उस ने हाथ जोड़ कर सम्राट को सलाम देते हुए कहाः सैन्य शिविर में मैं फोजी वर्दी पहने हुआ हूं , मैं सम्राट के लिए घुटने टेके नतमस्त नहीं कर सकता हूं , मुझे सैन्य शिष्टाचार नियम से आप को सलाम देने दें । चोयाफु के इस प्रकार के व्यवहार पर सम्राट हानवुती को बड़ा आश्चर्य लगा । उस ने गाड़ी पर थोड़ा झुक कर जवाबी सलाम दी और अपने कर्मचारियों को सेना में सम्राट का अभिवादन पहुंचवाया । इस के बाद वह शिल्यो शिविर से राजधानी छांगआन लौटने चले गया । लौटने के रास्ते में सम्राट के कर्मचारियों ने बड़े रोष के साथ चोयाफु की आलोचना करते हुए कहा कि इस ने सम्राट के साथ असह्य बुरा बर्ताव किया है । लेकिन सम्राट हानवुती ने उस की भूरि भूरि प्रशंसा करते हुए कहा कि चोयाफु एक सच्चे सेनापति है , बानशान और चिमन दोनों शिविरों का सैन्य अनुशासन काफी खराब है , यदि दिश्मन की सेना आकस्मिक आक्रमण करने पहुंची , तो वे सब उस के बंदी बन जाएंगे । चोयाफु अच्छी तरह सैना का कमान करना जानता है , दुश्मन को उस पर हमला बोलने का साहस नहीं होगा । इस निरीक्षण दौरे से सम्राट हानवुनती ने चोयाफु को एक सैन्य प्रतिभा माना ।

इस के दूसरे साल , हानवुनती को गंभीर बीमारी लगी , स्वर्गवास से पहले उस ने युवराज को पास बुला कर कहा कि यदि देश में कभी युद्ध हुआ , तो चोयाफु को पूरे देश की सेना का संचालन करने का काम सौंप दे , वह एक सुयोग्य सेनापति है । हानवुनती के निधन के बाद युवराज ल्यू छी सम्राट की गद्दी पर बैठा , जो हानचिंगती के नाम से मशहूर था । नव समाट युवा था , इस का मौका अच्छा समझ कर राजवंश के अधीनस्थ ल्यू बी समेत सात स्थानीय राजाओं ने सम्राट की गद्दी छीनने की कुचेष्टा में विद्रोह किया । सम्राट हानचिंगती ने चोयाफु को पूरे देश की सेना के सेनापति के पद पर नियुक्त किया और उसे विद्रोह का दमन करने का काम सौंपा । सात राजाओं की संयुक्त सेना तगड़ी और शक्तिशाली थी । उस के जबरदस्त हमले के सामने सेनापति चोयाफु ने प्रतिरक्षा की रणनीति अपनायी और उचित मौके के लिए घात में तैयार हुआ । सम्राट हानचिंगती ने उसे कई बार आज्ञापत्र जारी कर विद्रोही सेना पर जवाबी प्रहार करने में पलह करने का आदेश दिया , लेकिन चोयाफु ने एक भी नहीं माना । क्योंकि उसे मालूम था कि अभी दुश्मन की सेना प्रबल और जोश मनोबल में है , किन्तु विद्रोही सेना अन्याय की स्थिति में है , उस का मनोबल लम्बे समय नहीं टिकता है । चोयाफु का अनुमानसच निकला , थोड़े समय के बाद विद्रोही सेना ने हमला बोलने की जल्दबाजी की , पर चोयाफु के अभेद्य शिविर के आगे दुश्मन का हमला रंग नहीं आया । अंत में विद्रोही सेना का हौसला पस्त हो गया , उसे विवश हो कर पीछे हट जाना पड़ा । मौके से लाभ उठा कर चोयाफु ने अपनी सेना को दुश्मन सेना पर जबरदस्त जवाबी प्रहार करने की हुक्म दी और चोयाफु की सेना के अबाध्य प्रहार से विद्रोही सेना पूरी तरह परास्त हो गई और विद्रोही सेना के सरगना ल्यू बी की भी अपने अधीनस्थ लोगों द्वारा हत्या की गई । शेष छै राजाओं को भी शोचनीय हार से ताब न ला कर आत्महत्या करना पड़ा ।

सात स्थानीय राजाओं के विद्रोह का दमन कर दिया गया , पश्चिमी हान राजवंश का एकीरण सुदृढ किया गया और केन्द्र की सत्ता भी मजबूत हो गयी , चीन के इतिहास में एक शानदार काल शुरू हुआ ।

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