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यांगत्सी नदी की त्रिघाटी

2017-08-15 17:19:00
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यांगत्सी नदी चीन की सब से बड़ी नदी है और विश्व की तीसरी बड़ी नदी भी । यांगत्सी नदी के उपरी और मध्य भागों में तीन संकरी घाटियां हैं ,जो च्युतांग घाटी , वुशा घाटी और सीलिंग घाटी के नाम से मशहूर हैं , इन तीन घाटियों का एक साझा नाम है त्रिघाटी । त्रिघाटी की कुल लम्बाई दो सौ किलोमीटर है , वहां भौगोलिक स्थिति अद्भुत अनोखी और विरल है , प्राकृतिक सौंदर्य मनमोहक है और अनुपम दर्शनीय क्षेत्र के नाम से विश्वविख्यात है ।

यांगत्सी नदी की त्रिघाटी के पश्चिमी छोर पर विस्तृत च्युतांग घाटी के किनारे पर पाईती नगर के नाम का एक दर्शनीय स्थल है , जिस का नाम एक सच्ची एतिहासिक घटना पर आधारित है ।

ईस्वी 25 साल में चीन एक ऐसे एतिहासिक काल से गुजर रहा था , जबकि दो सौ साल तक चले पश्चिमी हान राजवंश का पतन हुआ था , पर नए राजवंश की स्थापना अभी नहीं हो पाई थी । देश युद्धरत स्थिति में पड़ गया । देश के दक्षिण पश्चिम भाग में अधिकृत स्थानीय सैन्य सरदार कङसुनशु राजनीतिक परिवर्तन की बाट जोह रहा था ।

कहा जाता था कि एक दिन कङसुनशु ने एक सपना देखा , जिस में किसी ने उसे बताया कि आप 12 साल के लिए सम्राट बनेंगे । इस सपने पर कङसुनशु को बड़ा आश्चर्य हुआ । दूसरे दिन की सुबह , जब वह उद्यान में टहल रहा था , तो अचानक देखा कि उद्यान की कुआ में से सफेद हवा श्वेत ड्रैगन की आकृति में ऊपर की ओर फुट कर उड़ गई । कङसुनशु समझता था कि यह उस के सम्राट बनने का आसार है । तभी ही उस ने अपने को सम्राट घोषित किया और सम्राट का नाम पाईती अर्थात सफेद सम्राट रखा । सम्राट की गद्दी पर बैठने के बाद उस ने च्युतांग घाटी के मुहाने पर निर्मित नगर का नाम बदल कर पाईती नगर यानी सफेद सम्राट नगर रखा और वहां बड़ी संख्या में सैनिक तैनात कर दिए ।

कङसुनशु का एक अच्छा दोस्त मा युन था , वह बड़ा प्रतिभाशाली और कार्यकुशल था । कङसुनशु के सम्राट बनने की खबर पा कर वह दूर से उस के पास आया । उस की कल्पना से परे था कि कङसुनशु ने उस के साथ पुराने मित्र के रूप में व्यवहार नहीं किया , बल्कि उस के सामने सम्राट का शौकत दिखाया । उस ने अपने आदमी को मा युन के लिए एक साधारण किस्म का सूती प्रजा वस्त्र बनाने की आज्ञा दी , इस के बाद भारी शाही सेना और मंत्री अधिकारियों के बीच जयजयकार के माहौल में कङसुनशु ने मायुन को राजमहल में बुलाया और उसे उच्चा पद सौंप कर राज्य की सेना के सेनापति के रूप में नियुक्त किया । मायुन के साथ पाईती नगर में आए अन्य लोगों को बड़ी खुशी हुई और सभी कङसुनशु के पदाधिकारी बनने को तैयार हो गए । किन्तु मा युन ने उन लोगों को समझा कि वर्तमान देश में हर जगह उपलव मच रहा है , अभी यह तय नहीं हुआ है कि देश की सत्ता किस के हाथ में आए । ऐसी स्थिति में भी कङसुनशु नहीं जानता है कि विनम्रता के साथ प्रतिभाओं का स्वागत किया जाए और उन के साथ राज्य के बड़े बड़े मामलों पर निर्णय लिया जाए , उलटे वह महज रस्म व शान शौकत जैसे गौर मसलों पर महत्व देता है , इस से जाहिर है कि वह एक दिखावे का राजा है , हम दूरदर्शी विवेक लोग उस के महल में काहीं सेवा कर सकते हैं । इस के बाद कङसुनशु को छोड़ कर मायुन तत्कालीन प्रतिभाशाली सेनापति ल्यू श्यो की सेना में भर्ती हुआ ।

मध्य चीन में सैन्य फतह में जुटे ल्यू श्यो ने लोयांग शहर में राष्ट्रीय स्तर के पूर्वी हान राजवंश की स्थापना की , उस ने कङसुनशु के नाम भेज कर देश की विभिन्न स्थितिओं का विश्लेषण कर उसे आत्मसमर्पित होने के लिए समझाया । लेकिन कङसुनशु ने अपने को सम्राट समझ कर आत्मसमर्पन से साफ इनकार किया । अंत में ईस्वी 37 में ल्यू श्यो की सेना ने कङसुनशु के राज्य पर आक्रमण कर कब्जा कर दिया और कङसुनशु भी सेना के उपलव में मारा गया ।

कङसुनशु 12 साल तक सम्राट की गद्दी पर बैठा , अखिलकार उस के राज्य का भी पतन हुआ। देश के दक्षिण पश्चिमी भाग में कङ��ुनशु का 28 सालों तक शासन रहा , इस के दौरान मध्य चीन में हो रहे युद्धों से देश का यह भाग बच गया और वहां अपेक्षाकृत रूप से शांति व सुरक्षा बनी रही । अपने शासन काल में कङसुनशु ने कृषि और जल सिंचाई के विकास पर ध्यान दिया और प्रजा के लिए हितकारी कल्याण काम किए। इस के कारण उस के मारे जाने के बाद स्थानीय लोगों ने उस की स्मृति में पाईती नगर में पाईती मंदिर बनाया ।

यांगत्सी नदी के त्रिघाटी क्षेत्र में पाईती नगर के अलावा बड़ी तादाद में एतिहासिक धरोहर और कथाएं देखने सुनने को मिलते हैं । उदाहरणार्थ त्रिघाटी के तटों पर 12 खूबसूरत पर्वत चोटियां खड़ी नजर आती है , जो देवी पर्वत चोटी के नाम से मशहूर है , हरेक पर्वत चोटी का अपना अलग नाम भी है , जिन के बारे में भी रूचिकर कहानी प्रचलित है ।

इन सालों में यांगत्सी नदी के त्रिघाटी क्षेत्र में विश्व की सब से बड़ी जल संसाधन परियोजना निर्माधीन हो रही है । अब तक त्रिघाटी में 110 से 175 मीटर गहरा जलाश्य बनाया गया , इस काम से त्रिघाटी क्षेत्र के कुछ एतिहासिक अवशेष और प्राकृतिक सौंदर्य जलमग्न हो गए , लेकिन कुछ नए प्राकृतिक सौंदर्य भी प्रकाश में आए।

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