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लामा धर्म का यङह मंदिर

2017-08-15 17:19:00
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पेइचिंग में बड़ी संख्या में प्राचीन वास्तु निर्माण उपलब्ध हैं , किन्तु ऐसा प्राचीन निर्माण केवल एक है , जिस में हान , मान , मंगोल और तिब्बत जातियों की शैली मिश्रित है , वह है यङह मंदिर यानी लामा मंदिर ।

यङह मंदिर विश्वविख्यात तिब्बती बौध धर्म के मंदिरों में से एक है , जिस का क्षेत्रफल 60 हजार वर्ग मीटर है और भवनों और कमरों की संख्या एक हजार से ज्यादा है । यङह मंदिर पहले छिंग राजवंश के मशहूर सम्राट खांगसी ने अपने चौथे पुत्र यनचन के लिए वर्ष 1694 में बनवाया था । वर्ष 1723 में खांगसी के निधन के बाद यनचन सम्राट की गद्दी पर बैठ गया , उस का घर शाही प्रासाद में स्थानांतरित हो गया और उस के इस पुराना घर-- यङह भवन का एक भाग शाही भवन के रूप में बदला गया और दूसरा भाग तत्कालीन लामा हुथुकथु को तिब्बती लामा धर्म के पीत संप्रदाय का मंदिर बनाने के लिए भेंट किया गया ।

पीत संप्रदाय लामा धर्म की एक शाखा है , उस का संस्थापक लोपचांग .जाकबा ( सन् 1357--1419) ने आठ साल की उम्र में लामा धर्म की दीक्षा स्वीकार की , 17 साल की उम्र में वह तिब्बत में लामा धर्म के अध्ययन के लिए चला गया । बाद में उस की धार्मिक शाखा आगे चल कर तिब्बत में सत्ता धारी संप्रदाय बन गयी , चुंकि इस संप्रदाय के सभी सदस्य पीले रंग के वस्त्र पहनते थे , इसलिए इसे पीत संप्रदाय के नाम से कहलाता था । पीत संप्रदाय के संस्थापक जाकबा ने लामा धर्म के सुधार के लिए भारी योगदान किया था , दलाई लामा और पंचन लामा दोनों उस के श्रेष्ठ चेले थे ।

यङह मंदिर में प्राचीन वास्तु निर्माण बहुत से ज्यादा सुरक्षित हैं , जिन में तीन कला अवशेष दुर्लभ और मूल्यवान माने जाते हैं ।

तीन दुर्लभ अवशेषों में से एक पांच सौ अर्हर पहाड़ का चंदन काम है , जो यङह मंदिर के धर्माचक्र भवन के पिछले हाल में सुरक्षित है । चंदन काष्ठ का यह तराशी काम चार मीटर ऊंचा और तीन मीटर लम्बा है । चंदन लकड़ी का रंग बैंगनी है और सुक्ष्म तराशी से एक पहाड़ खोदा गया है , इस तराशी काम में शांत पहाड़ी वादी है , हरेभरे देवतार वृक्ष हैं ,सुन्दर पगोडा है , प्राचीन शैली के भवन मंडप है , गुफाएं हैं , पत्थर के पथ हैं , सीढियां हैं , पुल है , जो झरनाओं से जुड़े हुऐ हैं । तराशी के काम सुक्ष्य , चित्र सुन्दर और अनूठे हैं । पहाड़ पर पांच सौ अर्हरों की छोटी छोटी मुर्तियां खोदी गई हैं , जो बेहद सुक्ष्म और विविध सजीव मुद्रा में जीता जागता होती है । यह मुर्तिकला और तराशी कला की अद्भुत कीमती कृति है , बड़े अफसोस की बात यह है कि कालांतर में इस कला कृति में केवल 449 अर्हर मुर्तियां रह गयी हैं ।

यङह मंदिर में सुरक्षित दूसरा दुर्लभ अमूल्य अवशेष मैत्रेय की विशाल प्रतीमा है , जो विशाल बुद्ध भवन में खड़ी हुई है । विशाल बुद्ध भवन मंदिर का सब से ऊंचा मंडप है , जो तीस मीटर ऊंचा है , भवन के तीन मंजिला छज्जे हैं , तमाम के तमाम निर्माण लकड़ी के हैं , बाहर देखने पर भवन तीन छज्जों वाला दिखता है , पर भीतर में नीचे से ऊपर तक समूचा भवन एक मंजिला है , बीच में सफेद रंग के चंदन काष्ठ की विशाल मैत्रेय प्रतीमा खड़ी है , समूची प्रतीमा 26 मीटर ऊंची है , जिस का आठ मीटर निचला भाग जमीन के अन्दर गड़ाया गया है । बाहर 18 मीटर ऊंची प्रतीमा जो खड़ी है , उस का व्यास आठ मीटर चौड़ा है और उस का पूरा वजन 100 टन है , यह विश्व में सब से बड़ी एकल लकड़ी की प्रतीमा है । वर्ष 1979 में जब मंदिर का जीर्णोद्धार किया जा रहा था , तो पता चला था कि जमीन के नीचे जो आठ मीटर की चंदन लकड़ी गाड़ी गई है , दो सौ सालों के लम्बे समय गुजरने के बाद भी अब लकड़ी बहुत मजबूत और कड़ी है और अच्छी तरह सुरक्षित रही है । इस से जाहिर होता है कि चीन के प्राचीन कलाकार काष्ठ मुर्ति कला तथा कलाकृति संरक्षण पर अनुपम स्तर पर पहुंच गए थे ।

यङह मंदिर में सुरक्षित तीसरा दुर्लभ अमूल्य अवशेष बुद्ध आलोक��� भवन की बुद्ध मुर्ति है । इस में शाक्यामुनि की कांस्य मुर्ति है , मुर्ति के पीठ पीछे आलोकन आला है , जो अमूल्य नांमू लकड़ी से सुक्ष्य नकाश कर बनाया गया है , नकाशी का काम अद्भुत और अनुपम है । आला भवन के फर्श से ऊपर छत तक सीधा खड़ा है , जो दो कमरों की ऊँचाई से ऊंचा है । सुर्यास्त की रोशनी में कांस्य बुद्ध मुर्ति शान से खड़ी नजर आती है , उस के सिर के पीछे पीतल के दर्पण आलोकन ताक से किरणों का चारों ओर विकिरण कर देते हैं , जिस से भवन में जलती अमर बत्तियों की रोशनी मिलने से पूरा भवन आलोकित हो उठता है । भवन में आला दो स्तंभों पर आधारित है , ऊंचे विशाल स्तंभों पर 99 ड्रैगनों के सुनहरे चित्र नकाश किए गए हैं , जो उत्तम और जीता जागता लगता है ।

यङह मंदिर में विभिन्न वास्तु निर्माणों की शैली और सज्जा सजावट भी बहुत सुन्दर और अनूठे है । वहां का धर्माचक्र भवन क्रॉस आकार में बनाया गया है , भवन की बाह्य छत तिब्बती शैली में पांच स्वर्णिय पगोडा जैसा निर्मित हुआ है , जो हान व तिब्बती वास्तु शैली का उत्कृष्ट मिश्रण है । मंदिर में सुरक्षित आलेख स्तंभों पर हान और मान , तिब्बती और मंगोल चार भाषाओं में छिंग राज्यवंश के सम्राट के हाथों लिखा लामा का इतिहास अंकित है , इस से छिंग राजवंश की धार्मिक नीति अभिव्यक्त हुई है और चीन की विभिन्न जातियों की एकता व्यक्त होती है । यङह मंदिर वर्ष 1981 से चीनी और विदेशी लोगों के लिए खोला गया , तब से हर साल कोई सौ लाख लोग मंदिर का दर्शन करने और पूजा करने आते हैं । आज का यङह मंदिरा बौध धर्म का तीर्थ स्थल होने के साथ हान , मान , तिब्बत तथा मंगोल जातियों की कला खजाना बन गया ।

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