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कवि छाओची की कहानी

2017-08-15 17:21:00
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चीन के इतिहास में त्रिराज्य काल के छाओछ्याओ का परिवार अत्यन्त मशहूर है । पिता छाओछ्याओ एक महान सैन्यविद्य और कवि था और उन के दो पुत्र छाओपी और छाओची भी प्राचीन चीन के सुप्रसिद्ध साहित्यकार थे । लेकिन साहित्य की दृष्टि से तीनों पिता पुत्रों में से छाओची का नाम सब से ऊंचा है ।

पिता छाओछ्याओ ईस्वी दूसरी शताब्दी के त्रिराज्य काल के वी राज्य का संस्थापक और राजा था , अपने युद्ध जीवन के दौरान उस ने अनेक कविताएं लिखी थीं , जो चीन के प्राचीन साहित्य इतिहास में काफी मशहूर है । छाओछ्याओ के बड़े पुत्र छाओपी अपने पिता की जगह ले कर वी राज्य के सम्राट की गद्दी पर बैठा । वह एक साहित्य समीक्षाकार था , उस की रचना साहित्य की समीक्षा चीन के साहित्य इतिहास में समीक्षा की एक महान कृति है । छाओची छाओछ्याओ का दूसरा पुत्र था , वह एक असाधारण प्रतिभाशाली व्यक्ति था और कला साहित्य के क्षेत्र में वह अपने पिता व बड़े भाई से भी आगे निकला था और तत्काल में सबसे श्रेष्ठ कवि माना जाता था ।

सम्राट की गद्दी पर बैठने के बाद छाओपी अपने भाई छाओची की प्रतीभा से बड़ी ईर्ष्या करता था । वह कई बार छाओची को खत्म करना चाहता था । एक बार किसी मामली बात को ले कर छाओपी ने छाओची को दंड देना चाहा । उस ने छाओची से कहा कि वह सात कदमों के समय के अन्दर एक पूरी छंद वाली कविता लिखे , यदि नहीं लिख पाया , तो उसे कड़े से कड़ा दंड दिया जाएगा । छाओची को मालूम था कि उस का बड़ा भाई जानबुझ कर उसे आफत में डालना चाहता था । लेकिन वह सम्राट था , छाओची को उस की आज्ञा बजाना पड़ेगा । यह सोच कर कि उस का सगा भाई उस का अत्याचार कर रहा था, छाओची को बड़ी दुख हुई । सात कदम नहीं गिन पाया था कि दुख से मारे छाओची ने एक कविता बना कर पढ़ सुनाईः दाल पकाने के लिए दाल का डंठल जलाया , हंडिया में रोया दाल बोला , दाल डंठल एक ही जड़ की उपज है , काही दाल को पकाने डंठल से बेरहम । इस गहरा अर्थ गर्भित कविता सुन कर सम्राट छाओपी को बड़ी शर्म आयी , तभी से उस ने अपने भाई को खत्म करने की अपनी सोच छोड़ दी ।

कवि के क्षेत्र में छाओची की उपलब्धियां अनुपम थी , उस के जीवन काल में चीन की भूमि पर युद्ध हुआ करता था , जन जीवन बहुत दुभर था । कुलीन परिवार में रहने पर भी छाओची ने अपनी कविताओं से बेघरबार आम प्रजा पर चिंता और सहानुभूति प्रकट की और देशोद्धार की भावना से प्रेरित अनेकों श्रेष्ठ कविताएं लिखीं । उस की कविता की यह उक्ति चीन में सदियों से लोकप्रिय रही हैः देश को मुसिबतों से उद्धारने के लिए बलिदान से नहीं कतरा , मौत को यो समझता हूं कि जन्म में पुनः लौटता ।

कवि छाओची को राजनीतिक क्षेत्र में भी अपनी प्रतीभा उजागर करने की इच्छा भी थी , इस ने उस के प्रति सम्राट भाई की ईर्ष्या और अत्याचार मोल लिया , इसलिए छाओची का जीवन बहुत मुश्किल और पेचीदा पड़ गया । अपनी इस प्रकार की दुख व अवसाद प्रकट करने के लिए छाओची ने कविता का सहारा ले लिया । अपनी कविताओं में उस ने अपने आदर्श को सुन्दर स्त्री का रूप सौंपा और बड़ी संख्या की कलाकृतियों में लावण नारियों का वर्णन किया । उस की मशहूर रचनाएं लावण नारी , दक्षिण में सुन्दरी और लोशन देवी उल्लेखनीय थी , जिन की सुन्दर नारियों में नेक चरित्र , बुद्धिमता तथा महात्वाकांक्षा की भरपूर अभिव्यक्ति होती है । छाओची ने ऐसी सुन्दर नारी के माध्यम से अपना मनोभाव व्यक्त किया था । खास कर लोशन देवी नाम के महा काव्य में तत्कालीन वी राज्य की राजधानी लोयांग के पास लोस्वी नदी की देवता लोशन की पौराणिक कथा के आधार पर एक सुशील व सुन्दर देवी का चित्रण किया गया , उस के प्रति छाओची ने अपना अपार प्यार व्यक्त किया , साथ ही देवता से नहीं मिल जा पाने की दुख और बेबसी जतायी । इसी तरह छाओची ने अपने आदर्श को साकार नहीं कर पाने की अपनी अवसाद प्रकट की थी । लोशन देवी काव्य चीन के साहित्य इतिहास में एक असाधारण स्थान रखता है, जो सदियों से सराहना के काबिले है ।

महा कवि छाओची केवल 41 साल जिन्दा था , लेकिन उस की साहित्यिक सफलता का उत्तरावर्ती चीनी साहित्य पर गहरा प्रभाव पड़ा है । सात कदमों के अंतराल में लिखी वह कविता कहावत के रूप में आज तक प्रयोग में लायी जाती है ।

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