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ताओ विचार पद्धति के स्वचिता लाओ रैन

2017-08-15 17:13:15
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लाओ रैन का परिवार नाम ली था और पूरा नाम ली अर था। चीनी लोग उन्हें लाओ ज़ी कहकर पुकारते थे। लाओ रैन के जन्म के बारे में ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है। लाओ रैन वसंत व शरत काल (ईसापूर्व 770 से ईसापूर्व 476) के अंत में छ्वू राज्य के निवासी थे। कहा जाता है कि लाओ ज़ी बड़े कद वाला आदमी था, उन का चौड़ा माथा और मोटे होंठ थे। लाओ रैन च्यो राज्य में पुस्तकों का प्रबंध करने वाला अधिकारी था। वह एक बुद्धिमान विद्वान भी था। जब खोंग ज़ी युवक थे, तो विशेष रुप से लाओ रैन से च्यो राज्य की रीति नीति के बारे में बहुत कुछ सीखा था। बाद में लाओ रैन ने देखा कि च्यो राज्य दिन प्रति दिन कमजोर होता जा रहा है, तो वे च्यो राज्य की राजधानी ल्वो यांग से चले गये। 

हेन कु क्वेन को पार करते समय लाओ रैन ने मशहूर नैतिकता शास्त्र "दाओ द चिंग" लिखा और बाद में लापता हो गए। कुछ लोगों के अनुसार, लाओ रैन का देहांत 60 वर्ष की उम्र में हुआ था और कुछ के अनुसार लाओ रैन 200 से भी ज्यादा की उम्र तक जीवित रहे थे। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि लाओ रैन वृद्धावस्था तक जीवित थे।

"ताओ द चिंग" का दूसरा नाम है "लाओ ज़ी", जिस में कुल पांच हजार से ज्यादा शब्द हैं, और जिस का विषय बहुत प्रचुर है। लाओ ज़ी प्राचीन चीन की संस्कृति की बहुत महत्वपूर्ण धरोहर है। लाओ रैन सरल यथार्थवादी दर्शनकार थे। चीन में उन्होंने प्रथम बार नैतिकता को दर्शन शास्त्र के सब से ऊंचे दायरे में शामिल करवाया। चीनी शब्द ताओ का मतलब रास्ता है। पुराने समय, लोग दाओ को नियम मानते थे। लाओ रैन ने प्रकृति के परिवर्तन और लोगों के बीच संबंधों का सर्वेक्षण किया और ताओ को नये अर्थ दिये। लाओ रैन का मानना है कि ताओ सब से सच्ची व ठोस चीज़ है।वह सभी ठोस चीज़ों का अंतिम स्रोत भी है।

ताओ द चिंग सरल यथार्थवादी दृष्टिकोणों से भरपूर था। यह लाओ ज़ी के दर्शनशास्त्र का सब से रंगीन भाग भी था। लाओ ज़ी का मानना था कि प्रकृति की सभी चीज़ें अलगाव में नहीं मौजूद हैं, बल्कि वे सब एक दूसरे के सहअस्तित्व में मौजूद हैं।

ताओ द चिंग में लाओ रैन ने चीज़ों के परिवर्तन के नियमों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सुख व दुख को एक दूसरे में परिवर्तित किया जा सकता है। दुख में सुख का तत्व मौजूद है, जबकि सुख में भी दुख का तत्व शामिल रहता है। लाओ रैनने यह भी पता लगाया कि यदि किसी चीज़ की संख्या में वृद्धि हो, तो गुणवत्ता में भी परिवर्तन हो सकता है। उन्होंने उदाहरण दिया कि एक छोटा सा बीज निरंतर बढ़ने से एक बड़ा पेड़ बन जाता है। मिट्टी के कणों से ऊंची ऊंची इमारतें बनायी जा सकती हैं। उन्होंने लोगों को यह भी बताया कि मुसीबतों से नहीं डरना चाहिए। यदि लोग छोटे छोटे प्रयासों से भी काम लेते रहेंगे, तो जरुर कठिनाइयों को दूर करके महान कार्य कर सकेंगे।

लाओ रैन युद्ध का विरोध करते थे। उन्होंने कहा कि बड़े युद्ध के बाद अवश्य ही विपत्ति आती है। लाओ रैन सत्तारुढ़ वर्ग के कठोर और बलभर आधारित प्रशासन का भी विरोध करते थे।

लाओ रैन ने अपने मन में काल्पनिक समाज का विविधतापूर्ण वरण भी किया था। इस समाज में कम लोग थे जो छोटे राज्य में रहते थे। राज्य में हथियार होते थे, लेकिन, इन का इस्तेमाल नहीं किया जाता था। राज्य में गाड़ियां व जहाज़ भी होते थे, लेकिन लोग इन पर सवार नहीं होते थे। जनता अच्छी तरह खाना खा सकती थी, सुन्दर कपड़े पहनती थी और आराम से जीवन बिता सकती थी। राज्य के लोग पड़ोसी राज्य को देख तो सकते थे, लेकिन, दोनों राज्यों की जनता एक दूसरे के यहां नहीं आती जाती थी। यहां का जीवन बहुत सरल था और शब्दों के इस्तेमाल की जरुरत भी नहीं थी। लोग सूत पर घटनाओं की याद कर सकते थे। हालांकि लाओ रैन के इस तरह के विचार आशावादी नहीं थे, फिर भी यह इस बात को प्रतिबिंबित तो करते थे कि लाओ रैनवसंत व शरत काल के निरंतर युद्धों के प्रति घृणा करते थे और शांत व सुखमय जीवन बिताना चाहते थे।

लाओ रैन के दर्शनशास्त्र का चीन के दर्शनशास्त्र के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। उन की राजनीतिक विचारधारा ने बाद में उग्रवादी विचारकों और समाज सुधारकों पर प्रभाव डाला था।

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