“9/11”की 20वीं वर्षगांठ पर फिल्म“माई नेम इज ख़ान”दोहरायी

2021-09-09 15:53:09

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इस वर्ष के 11 सितंबर को अमेरिका में हुए“9/11”आतंकवादी हमले की 20वीं वर्षगांठ है। अगर हम इस दुर्घटना की चर्चा करें, तो प्रसिद्ध भारतीय निर्देशक करण जौहर द्वारा निर्देशित दुखद फिल्म "माई नेम इज ख़ान" के बारे में बात करनी है। फिल्म के मुख्य पात्र और पात्रा भारतीय फिल्म स्टार शाहरुख खान और काजोल द्वारा निभाए गये हैं। 2010 में रिलीज़ होने के बाद, इसने मौजूदा दौर में बॉलीवुड फिल्मों के बॉक्स ऑफिस पर टॉप किया। निस्संदेह, इस फिल्म के निर्देशक को आतंकवाद की बहुत गहरी समझ है, और फिल्म के कला रूप के माध्यम से, वे आतंकवाद से लोगों को होने वाले नुकसान की पूरी तरह से व्याख्या करते हैं। तो चलिए आज हम इस फिल्म के बारे में अपनी समझ को एक नए अनुभव के साथ फिर से ताज़ा करते हैं।

यह फिल्म मुख्य पात्र रिजवान खान की कहानी बताती है। जो हल्के आत्मकेंद्रित की समस्या से पीड़ित हैं। वे भारत से अमेरिका में आकर बसे। वहां उनकी मुलाकात सुन्दर सिंगल मां मंदिरा खान से हुई और उनसे शादी भी की। लेकिन दुर्भाग्य है कि“9/11”आतंकवादी हमले के बाद भेदभाव, अपमान, पिटाई और यहां तक ​​कि आम मुसलमानों की हत्या की लगातार घटनाओं के साथ, अमेरिका में इस्लाम विरोधी प्रवृत्ति शुरू हो गई। रिजवान खान का बेटा भी शिकार बना। केवल नाम में विशिष्ट मुस्लिम उपनाम "खान" होने के कारण तो कई सहपाठियों ने उन्हें बेरहमी से पीट-पीट कर मार डाला। इस के बाद रिजवान खान पीठ पर एक बैग के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति के पीछे दौड़ने लगे। क्योंकि वे राष्ट्रपति से यह कहना चाहते थे कि मेरा नाम खान है, पर मैं आतंकवादी नहीं हूं। इस दौरान रिजवान खान पर भी बार-बार एक आतंकवादी होने का संदेह किया गया है, आम अमेरिकियों के साथ भेदभाव किया गया है, और पुलिस द्वारा उनकी तलाशी ली गई, पीटा गया और यहां तक ​​कि कैद भी किया गया। लेकिन उन्होंने अपना मूल इरादा नहीं बदला और अपने मिशन को पूरा करने पर जोर दिया।

इस फिल्म देखते हुए यह महसूस हुआ है कि फिल्म के कई दृश्य वास्तविक दुनिया में भी हमें मिल सकते हैं।

पहला दृश्य: फिल्म में "9/11 घटना" के बाद, भारतीय अमेरिकियों को एक दुखद अनुभव का सामना करना पड़ा। जिस मस्जिद में वे इबादत करते थे, उसे नष्ट कर दिया गया, जिस दुकान को वे चलाते थे उसे लूट लिया गया, और उनके बच्चों को भी धमकाया गया। वास्तविक दुनिया में जब अमेरिका में कोविड-19 महामारी का प्रकोप हुआ, तो वहां रहने वाले चीनी लोगों को भी ऐसे दुर्व्यवहार मिला। हालांकि महामारी की रोकथाम करने के लिये वे गंभीरता से विभिन्न नीति-नियमों का पालन करते हैं, और अमेरिका के सभी जातीय समूहों में चीनी लोगों की संक्रमण दर सबसे कम है। लेकिन वे इस महामारी में कलंक झेलने वाले एकमात्र जातीय समूह बन गए हैं। इसके अलावा, इस तरह का हमला शब्दों से अधिक है। चीनी लोगों के खिलाफ "घृणित अपराध", विशेष रूप से हिंसक व्यवहार और भी जघन्य है।

दूसरा दृश्य: फिल्म में जब रिजवान खान एक मस्जिद में नमाज अदा कर रहे थे, तो उन्होंने देखा कि एक कट्टरपंथी आस्तिक आतंकवाद का प्रचार कर रहा था और जनता को हिंसक विरोध करने के लिए प्रेरित कर रहा था। वे बहादुरी से खड़े हुए और इस आदमी पर झूठा होने का आरोप लगाया, क्योंकि उसने अल्लाह की शिक्षा का उल्लंघन किया, और अल्लाह अपने अनुयायियों को मरने नहीं देगा। साथ ही रिजवान ने इस आदमी को पकड़ाने के लिये पुलिस को भी बुलाया। हां, रिजवान ने बिल्कुल सही कहा। चाहे वह ईसाई धर्म, इस्लाम, हिंदू धर्म, ताओ धर्म या बौद्ध धर्म हो। यद्यपि वे भिन्न-भिन्न देवताओं को मानते हैं, पर उनका मूल उद्देश्य दूसरों को अच्छा करने के लिए राजी करना है। इस दुनिया में, हमेशा उल्टे इरादे वाले लोग होते हैं। अपने स्वयं के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए, वे अनुयायियों की विश्वासयोग्यता का उपयोग उन्हें अवैध गतिविधियों में फंसाने के लिए करते हैं, और यहां तक ​​कि आतंकवादी हमलों को अंजाम देने के लिए अपने जीवन का बलिदान भी देते हैं। जैसे चीन के शिनच्यांग में हुईं हिंसक और आतंकवादी घटनाएं हैं, इन के पीछे काले हाथ तो "विश्व उइगुर कांग्रेस" और "पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक आंदोलन" जैसे आतंकवादी संगठन हैं। वे आतंकवादी उपाय से शिनच्यांग को चीन से विभाजित करने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिये चीन सरकार द्वारा अपनाए गए आतंकवाद विरोधी और कट्टरपंथ से मुक्ति के उपाय पूरी तरह से उचित, कानूनी और संदेह से परे हैं। केवल इन राक्षसों को शिनच्यांग से बाहर निकालकर ही वहां के लोग सुखी और शांतिपूर्ण जीवन जी सकते हैं। तथ्यों ने यह भी साबित कर दिया है कि चीन सरकार ने वास्तव में यह हासिल किया है। वर्तमान में शिनच्यांग के सभी जातीय समूह समान और एकजुट हैं, धर्म सामंजस्यपूर्ण हैं, और लोगों का जीवन स्थिर और शांतिपूर्ण है।

तीसरा दृश्य: फिल्म में, अमेरिकी पुलिस ने रिजवान को बिना किसी सबूत के गिरफ्तार कर लिया, उन्हें कैद और यातनाएं दीं, बस यह स्वीकार करने के लिए कि वे अल-कायदा से जुड़े थे। इसे देखकर लोगों को कोविड-19 वायरस के ट्रेसबिलिटी की याद आ रही है। हालांकि अमेरिका के पास कोई सबूत नहीं है, लेकिन वह इस बात पर जोर देता है कि कोरोना वायरस चीन की एक प्रयोगशाला से आया है। भले ही विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दो बार वैज्ञानिक टीम को चीन के वुहान में भेजकर इस बात की जांच-पड़ताल की, और चीन की बेगुनाही साबित करते हुए एक आधिकारिक संयुक्त शोध रिपोर्ट भी जारी की है। लेकिन अमेरिका ने अभी भी इस बात को स्वीकार नहीं किया, और चीन को बदनाम करने और वायरस की ट्रेसबिलिटी के राजनीतिकरण के लिए वह लोगों को भड़काने में लगा हुआ है।

वास्तव में अफ़गान युद्ध और इराक युद्ध में अमेरिका ने भी यह कार्रवाई की। अमेरिका ने आतंकवाद विरोध के नाम पर अफगानिस्तान में युद्ध शुरू किया और मध्य एशिया में प्रवेश करने का अवसर लिया। पर परिणाम क्या निकला? आतंकवाद को दूर करने के बजाए अमेरिका ने अफगान लोगों को गंभीर संकट में डाला। जहां तक ​​इराक युद्ध के कारण की बात है, तो यह और भी निंदनीय है। अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को इस आधार पर दरकिनार किया कि इराक के पास सामूहिक विनाश के हथियार छिपे थे और गुप्त रूप से आतंकवादियों का समर्थन किया था, और इराक पर एकतरफा सैन्य हमले किए। हालांकि, युद्ध   सात साल से अधिक समय तक चला, और अमेरिका को कभी भी सामूहिक विनाश के हथियार नहीं मिले जो उसने कहा था। अंत में, युद्ध को जल्दी से समाप्त करना पड़ा।

वास्तव में, फिल्म "माई नेम इज ख़ान" में अभी भी इस तरह की कई पेचीदा स्थितियां हैं, और आपको इसे ध्यान से देखने की जरूरत है। अंत में, हम ऐसी फिल्म की शूटिंग के लिए भारतीय निर्देशक को अपने दिल के नीचे से धन्यवाद देना चाहते हैं जो ऐतिहासिक और अधिक यथार्थवादी दोनों है। "9/11" की 20वीं वर्षगांठ के अवसर पर इस उत्कृष्ट कृति को फिर से देखना, मुझे विश्वास है कि हर कोई अपने दिल में भावनाओं से भरा होगा।

चंद्रिमा

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