तिब्बती बौद्ध धर्म की वास्तुकला

2021-02-22 11:15:05

तिब्बती बौद्ध धर्म की वास्तुकला_fororder_微信图片_20210222111406

 

दुनिया में बौद्ध धर्म प्रणाली भाषा के अनुसार चीनी हान जातीय बौद्ध धर्म, तिब्बती जातीय बौद्ध धर्म और दक्षिणी बौद्ध धर्म में विभाजित है। प्रत्येक समूह की अपनी अनूठी वास्तु कला है। तिब्बती बौद्ध धर्म का हजार वर्षों से तिब्बती जाति और मंगोलियाई जाति जैसे के लोगों पर प्रभाव पड़ा है। मंगोलियाई और तिब्बती क्षेत्रों में अधिकांश लोग तिब्बती बौद्ध धर्म को मानते हैं, और तिब्बती बौद्ध मंदिर विश्वासियों का आध्यात्मिक जीविका है। इसके अलावा, तिब्बती बौद्ध मठों में कई सामाजिक भूमिकाएं हैं जैसे कि शिक्षा, चिकित्सा और धर्मार्थ संगठन।

पेइचिंग शहर में स्थित योंग-ह मंदिर यानी लामा मंदिर एक बहुत प्रसिद्ध तिब्बती बौद्ध भवन है। योंग-ह मंदिर मूल रूप से छिंग राजवंश के सम्राट योंगजंग का महल था। 1735 में, सम्राट योंगजंग  की अचानक मृत्यु हो गई, और फिर योंग-ह मंदिर को एक तिब्बती बौद्ध शाही मंदिर में बदल दिया गया। योंग-ह मंदिर के पूरा होने के बाद, यह राजधानी में तिब्बती बौद्ध धर्म गतिविधियों का केंद्र बन गया। तिब्बत, मंगोलिया और अन्य क्षेत्रों में प्रख्यात भिक्षुओं के लिए यह मंदिर केंद्र सरकार और मंगोलियाई-तिब्बत क्षेत्र के बीच एक सेतु बन गया। योंग-ह मंदिर अभी भी चीनी बौद्ध अनुयायियों के लिए पूजा का केंद्र है। पेइचिंग शहर के लोगों में नए साल के पहले दिन इस मंदिर में जाकर अगरबत्ती जलाने की परंपरा है, और कॉलेज प्रवेश परीक्षा में भाग ले जाने वाले छात्र भी परीक्षा से पहले योंग-ह मंदिर जाकर अगरबत्ती जलाते हैं।

सांगये मठ तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के शान्नान क्षेत्र में स्थित है और तिब्बती बौद्ध धर्म के महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक है। सांगये मठ के समृद्ध भित्ति चित्र हैं। कलात्मक कौशल के संदर्भ में सांगये मठ में भारत, नेपाल, हान और मध्य एशिया की कलात्मक तकनीकों और सौंदर्य संबंधी अवधारणाओं को आत्मसात किया और इसके आधार पर तिब्बती कला शैली का गठन हुआ। यह पूरी तरह से जाहिर है कि तिब्बती संस्कृति में शुरू से ही विभिन्न क्षेत्रों की संस्कृति और कला सम्मिलित हो गयी और सांगये मठ प्राचीन काल में एक विविध और खुली सांस्कृतिक मानसिकता का एक उदाहरण है।  

तिब्बत स्वायत्त प्रदेश की ल्हासा नदी के दक्षिणी किनारे पर गैंडेन मठ का निर्माण महा गुरु त्सोंगखापा के लिए किया जाता था। गैंडेन मठ की स्थापना से त्सोंगखापा द्वारा वकालत किए गए गेलुग संप्रदाय के रखरखाव को दर्शाया गया है और त्सोंगखापा के सम्मान में अनुयायियों और आम लोगों की आस्था दिखती है। यह कहा जा सकता है कि त्सोंगखपा की उपलब्धियों और खूबियों से गैंडन मठ को छह प्रमुख गेलुग मठों में से पहला स्थान पर रखा गया है और इसके आधार पर यह सैकड़ों वर्षों से समृद्ध होता रहा है। आज तिब्बती बौद्ध धर्म के भिक्षुओं के प्रशिक्षण के लिए गैंडेन मठ का भी काफी महत्व प्राप्त है।   

पेइचिंग शहर में स्थित शीहुआंग मंदिर की वास्तुकला भारत, तिब्बत और हान जाति की स्थापत्य संस्कृति और कला को एकीकृत करती है। यह तिब्बती बौद्ध वास्तुकला और यहां तक ​​कि प्राचीन चीनी वास्तुकला के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। मंदिर वास्तुकला तिब्बती बौद्ध धर्म के स्थानीयकरण का उदाहरण भी माना जाता है। छिंग राजवंश के शुनझी (1652) 9वें वर्ष में निर्मित शीहुआंग मंदिर का क्षेत्रफल 900 वर्ग मीटर से अधिक है और यह पेइचिंग शहर के संरक्षित सांस्कृतिक अवशेषों की नामसूची में शामिल है। शीहुआंग मंदिर की वास्तुकला अतीत से लेकर समकालीन तक की वास्तुकला संस्कृति के ऐतिहासिक परिवर्तनों और अभिनव विकास को दर्शाती है। यह प्राचीन काल से बौद्ध धर्म के स्थानीयकरण का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

उत्तरी चीन के चेंग्दे शहर में निर्मित पुनिंग मंदिर में "तिब्बत, हान और भारत" के कलात्मक वास्तुकला की विशेषता दर्शाती है। चीन में प्रवेश होने के लंबे समय के चलते बौद्ध धर्म चीनी पारंपरिक संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। लगभग 23,000 वर्ग मीटर के क्षेत्र को कवर करते हुए पुनिंग मंदिर का निर्माण चीनी छिंग राजवंश (1755) में किया गया था। पुनिंग मंदिर की मुख्य बुद्ध प्रतिमा 27.21 मीटर ऊंची है। वर्ष 1961 में चेंग्दे शहर के पुनिंग मंदिर को राष्ट्रीय प्रमुख सांस्कृतिक अवशेष संरक्षण इकाई के रूप में चीनी राज्य परिषद द्वारा अनुमोदित किया गया।

तिब्बती बौद्ध धर्म की वास्तुकला_fororder_微信图片_20210222111410

लोकप्रिय कार्यक्रम
रेडियो प्रोग्राम
रेडियो_fororder_banner-270x270