तिब्बती जनता है अपने देश के स्वामी

2021-02-08 16:43:06

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तिब्बत के बारे में चर्चित विषय गर्मागर्म हो रहा है। अमेरिका की कांग्रेस में तथाकथित "2020 तिब्बत नीति और सहायता अधिनियम" पारित किया गया, जबकि कुछ और देशों ने इसका समर्थन प्रकट किया। जिसने चीन की तरफ से दृढ़ आक्रोश और विरोध को जन्म दिया है। चीन और भारत तथाकथित तिब्बत सवाल पर सीधे तौर पर संबंधित हैं। क्योंकि तिब्बत स्वायत्त प्रदेश के अस्तित्व से चीन और भारत पड़ोसी देश बने। इसलिए, तिब्बत पर सवालों को स्पष्ट करना अपरिहार्य है। 

तिब्बत प्राचीन काल से चीन का एक अभिन्न हिस्सा रहा है। प्रासंगिक ऐतिहासिक अभिलेखों का युआन राजवंश के ग्रंथों में पता लगाया जा सकता है। चीन के अंतिम राजवंश यानी छिंग राजवंश के दौरान, केंद्र सरकार ने सीधे तिब्बत का कारगर शासन किया था। छिंग राजवंश के सम्राट ने यहां तक कि सेना भेजकर हिमालय पर्वत को पार कर गोरखा की आक्रमणकारी सेना को हरा दिया था। यह ऐतिहासिक तथ्य तिब्बत के तशिलहंपो में संरक्षित प्राचीन काल के एक पत्थर के स्मारक से साबित होता है। इसलिए, यह निर्विवाद है कि तिब्बती लोग चीनी राष्ट्रीय समुदाय के सदस्य हैं। 
दलाई गुट ने यह दावा किया कि तिब्बत एक स्वतंत्र देश हुआ करता था। लेकिन दुनिया के दूसरे देशों में संरक्षित प्राचीन काल के नक्शों में तिब्बत चीन के दायरे में क्यों रहता है? और ये ऐतिहासिक तथ्य भी हैं कि 1951 में तिब्बत की शांतिपूर्ण मुक्ति हुई थी और दलाई ने खुद भी एक बार चीनी राष्ट्रीय जन प्रतिनिधि सभा के उपाध्यक्ष के रूप में कार्य किया। केवल सन 1959 में अलगाववादी ताकतों द्वारा विद्रोह किए जाने के बाद और अमेरिका समेत चीन विरोधी ताकतों के समर्थन के कारण से ही तिब्बत की स्वाधीनता एक सवाल के रूप में सामने आयी। 
शांतिपूर्ण मुक्ति के बाद से, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने तिब्बती जनता को लोकतांत्रिक सुधारों को आगे बढ़ाने, समाजवादी व्यवस्था स्थापित करने और आर्थिक सुधार को बढ़ावा देने में नेतृत्व किया। तिब्बत के आर्थिक और सामाजिक विकास में सर्वांगीण प्रगतियां हासिल की गयी हैं। 1959 में तिब्बत में लोकतांत्रिक सुधारों को लागू किया गया जिससे सामंती भू-दास प्रणाली को समाप्त किया गया, दस लाख भू-दासों को मुक्त कर दिया गया और उन्हें नए तिब्बत का स्वामी बनाया गया। उन्हें स्वतंत्र रूप से राष्ट्र और अपने क्षेत्र के मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार प्राप्त हुआ।  
वर्तमान में, तिब्बत स्वायत्त प्रदेश में विभिन्न स्तरों वाली जन प्रतिनिधि सभाओं के 35,900 प्रतिनिधि हैं, जिनमें से लगभग 92% तिब्बती और अन्य अल्पसंख्यक जातीय के हैं। तिब्बत स्वायत्त प्रदेश की जन प्रतिनिधि सभाएं स्थानीय नियमों की स्थापना करती हैं और जिससे कानूनी ढ़ंग से तिब्बती जनता के स्वामी होने के अधिकार की गारंटी दी जाती है।   

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तिब्बत की मौजूदा स्थिति कैसी है?

तिब्बत मुद्दे पर चर्चा करते समय, इस सवाल से बचना असंभव है यानी कि तिब्बत में मौजूदा स्थिति कैसी रही है?और क्या तिब्बती लोग कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार के काम से संतुष्ट हैं?आज तिब्बत का आर्थिक और सामाजिक विकास बड़ी तेजी से किया जा रहा है और तिब्बती लोग शांतिपूर्ण वातावरण में जीवन की खुशियों का आनन्द ले रहे हैं। 
शांतिपूर्ण मुक्ति से पहले, तिब्बत में एक भी राजमार्ग नहीं था। लेकिन आज राजमार्ग, रेलवे और विमानन की सुविधाओं से तिब्बत दूसरे क्षेत्रों के साथ जुड़ा हुआ है। अब तिब्बत में हाई स्पीड मार्गों का विस्तार भी जारी है। स्वायत्त प्रदेश में राजमार्गों की दूरी 103,600 किलोमीटर तक पहुंच गयी है। साथ ही तिब्बत में शिक्षा के विकास को प्राथमिकता मिल पायी है और सभी बच्चों को 15 सालों की मुक्त शिक्षा लागू की गयी है। इसके अलावा तिब्बती लोगों को पर्याप्त रोजगार के अवसर भी मिले हुए हैं। जनता का सांस्कृतिक जीवन समृद्ध और रंग-बिरंगा है और पारंपरिक राष्ट्रीय संस्कृति को भी अच्छी तरह संरक्षित किया जाता है। 
तिब्बत की जनसंख्या सन 1959 के 12.28 लाख से बढ़कर वर्ष 2018 तक 34.38 लाख तक पहुंच गई। कुल आबादी में 90% से अधिक भाग तिब्बती लोगों का होता है। चिकित्सा और स्वास्थ्य कार्यों के स्तर में बहुत सुधार हुआ है और तिब्बती लोगों की औसत जीवन प्रत्याशा भी बढ़कर 70.6 वर्ष तक हो गई है। साल 2020 तक तिब्बत के गरीबी उन्मूलन कार्यों में उल्लेखनीय प्रगतियां हासिल की गयी हैं। सभी काउंटियों में गरीबी-उन्मूलन का लक्ष्य पूरा किया गया है। तिब्बती लोगों को और अधिक सुख प्राप्त हुआ है। आज तिब्बत का अच्छी तरह संरक्षित पारिस्थितिक वातावरण है। सरकार संरक्षण और निर्माण दोनों पर जोर देने की नीतियां अपनाती है। तिब्बत स्वायत्त प्रदेश में प्राकृतिक संरक्षण क्षेत्रों का क्षेत्रफल कुल क्षेत्रफल के एक तिहाई तक पहुंचा है। तिब्बत अभी भी दुनिया में सबसे अच्छे पर्यावरणीय क्षेत्रों में से एक माना जाता है। 
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय कमेटी हमेशा तिब्बत पर विशेष ध्यान देती रही है। केंद्र ने तिब्बत की सहायता से सात सभाएं आयोजित की हैं और तिब्बत के लिए विशेष अधिमान्य नीतियां तैयार की हैं। देश के दूसरे राज्यों ने भी तिब्बत का जोरदार समर्थन किया है। साथ ही केंद्र सरकार ने तिब्बत में धार्मिक स्वतंत्रता नीति अपनायी है। वर्तमान में तिब्बत में कुल 1,787 धार्मिक गतिविधि स्थल स्थापित किये गये हैं और मठों में रहने वाले भिक्षुओं और ननों की संख्या 46,000 तक जा पहुंची है। तिब्बती बौद्ध मंदिरों में शास्त्रों का अध्ययन, धार्मिक उत्सव और तीर्थयात्रा जैसी पारंपरिक गतिविधियाँ सामान्य रूप से चल रही हैं। तिब्बत के धार्मिक अनुयायियों के घरों में आम तौर पर सूत्र रूम या बौद्ध केंद्र होते हैं। केंद्र सरकार ने तिब्बती बौद्ध धर्म की रक्षा करने के लिए "धार्मिक मामलों पर विनियम" और "तिब्बती बौद्ध धर्म के जीवित बुद्ध के पुनर्जन्म के लिए प्रशासनिक उपायों" को जारी किया है। 

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तिब्बती लोगों को पूरी स्वतंत्रता प्राप्त है

अमेरिका ने तथाकथित "2020 तिब्बत नीति और सहायता अधिनियम" पारित कर चीन के अन्दरूनी मामलों में हस्तक्षेप किया, जबकि कुछ और देशों ने भी इसका साथ दिया। उनका कहना है कि तिब्बती लोगों को अपनी स्वतंत्रता से वंचित किया गया है। पर वास्तव में क्या तिब्बती लोग धार्मिक स्वतंत्रता सहित बुनियादी स्वतंत्रता का आनंद ले सकते हैं? इस मामले पर स्पष्टीकरण देने का अधिकार केवल तिब्बती लोगों के पास ही है।  
तथाकथित "तिब्बत सवाल" के प्रति अमेरिका ने लंबे अरसे से "मानवाधिकार" और "धार्मिक स्वतंत्रता" की आड़ में चीन के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप किया है। सन 1959 में तिब्बत में हुए विद्रोह के पीछे अमेरिका का हाथ था जिसे अमेरिका ने खुद भी मान लिया है। उस समय से अब तक दलाई समूह अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों में जीवित रहने और फलने-फूलने में सक्षम रहा है, इसका कारण यह है कि दलाई समूह को अमेरिका से पूर्ण समर्थन मिला है। अमेरिका के समर्थन से दलाई लामा को नोबेल शांति पुरस्कार सहित अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठाएं हासिल हुई हैं। केवल "अमेरिका 2020 के आगे व्यापक विनियोग अधिनियम" में निर्धारित "तिब्बत सहायता निधि" की मात्रा 1.9 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक पहुंची है। जो दलाई समूह के जीवित रहने के लिए आय का मुख्य स्रोत है। 
अमेरिका के समर्थन से चीन को विभाजित करने के लिए दलाई समूह के अहंकार को उत्तेजित किया गया है। लेकिन तिब्बती लोग इसे सहमत नहीं हैं। शांतिपूर्ण मुक्ति और लोकतांत्रिक सुधार के बाद तिब्बती लोग अपने जमीन के स्वामी बन गए हैं। आज आर्थिक और सामाजिक विकास के कारण तिब्बती लोगों के जीवन स्तर में निरंतर सुधार होता रहा है। और वे मानवाधिकार का पूर्ण संरक्षण और धार्मिक विश्वास की पूरी स्वतंत्रता का भी आनंद लेते हैं जो लोकतांत्रिक सुधारों से पहले उपलब्ध नहीं थे। उदाहरण के लिए वर्तमान में तिब्बत में 1,787 धार्मिक स्थलों, मठों में 46,000 भिक्षुओं और 358 जीवित बुद्धों के अलावा, 4 मस्जिद और 1 कैथोलिक चर्च भी मौजूद हैं, जो तिब्बत में 12 हजार मुस्लिम और सात सौ कैथोलिक अनुयायियों की सेवा के लिए स्थापित हैं। यह कहा जा सकता है कि तिब्बत में जो कानूनी धार्मिक गतिविधि है, इससब की जरूर गारंटी दी जाती है।  
चीन के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने की किसी भी विदेशी कोशिश पर चीनी लोग कभी सहमत नहीं होंगे। जैसे चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने कोरियाई प्रायद्वीप में हुए अमेरिकी आक्रमणकारी सेना के विरूद्ध युद्ध की 70वीं वर्षगांठ पर आयोजित एक सभा में कहा है, " चीनी लोग परेशानी तलाशते नहीं हैं, पर न ही हम उनसे डरते हैं। चीनी लोग किसी भी मुश्किल और धौंस-धमकी के सामने अपना सिर नहीं झुकाएंगे!"   
उधर चीन के अपनी स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करने के प्रयासों का व्यापक समर्थन दुनिया के अधिकांश देशों द्वारा किया गया है। अमेरिका द्वारा "मानवाधिकार" और "धार्मिक स्वतंत्रता" के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय कानून और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के बुनियादी मानदंडों को रौंदने और अन्य देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने की कोशिश विश्व जनता के हितों का उल्लंघन है। चीन के खिलाफ "तिब्बत कार्ड" खेलने की अमेरिकी साजिश निश्चित रूप से विफल होगी।

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