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    चित्र के अनुसार बढ़िया घोड़े की खोज
    2016-11-07 15:09:50 cri

    बंदर और बाघ 猱和老虎

    नीति कथा प्राचीन काल में बहुत लोकप्रिय थी। इसे पढ़ने से लोगों को मजा के साथ शिक्षा भी मिलती है, ताकि वे उसी प्रकार की गलती से बच सके। चीन के लम्बे पुराने इतिहास के दौरान बड़ी संख्या में नीति कथाएं लिखी गई और लोगों में बहुत पसंद आई थी। बहुत सी नीति कथाएं आज के युग में भी काफी लोकप्रिय रही और चीनी जनता, खास कर बाल बच्चों के लिए पसंदीदा सांस्कृतिक रचनाएं बनी रही तथा लोगों की जबान पर रही है।

    "बंदर और बाघ"शीर्षक नीति कथा को चीनी भाषा में"नाओ ह लाओहू"(náo hé lǎo hǔ) कहा जाता है। इसमें"नाओ"का अर्थ है"बंदर", "लाओहू"का मतलब है"बाघ", जबकि"ह"का अर्थ है"और"। इस नीति कथा को"खुशामद पसंद करने वाला बाघ"के नाम से भी जाना जाता है।

    जंगल में बंदर की एक विशेष जाति रहती है, इस जाति के बंदर शरीर में हल्का व चुस्त और पेड़ पर चढ़ने में माहिर होता है। उसके पंजे तेज चाकू की भांति हैं। वह वन-राजा के नाम से मशहूर बाघ को खुशामद करना जानता है।

    बाघ के सिर में अकसर खुजनी आती है, खुजनी असह्य होने पर बाघ पेड़ के तन पर सिर रगड़ रगड़ कर खुजनी को दूर करने की कोशिश करता है। इसे देख कर बंदर ने बड़ी मीठी शब्दों में कहा,"बाघ दादा, देखो, पेड़ का तन बड़ा गंदा है, फिर तो इस पर सिर रगड़ने से खुजनी दूर भी नहीं हो सकती। बेहतर है कि मैं आप की खुजनी का अन्त करने आप के सिर पर खजाता हूं।"

    यह कह कर बंदर फांद कर बाघ के सिर पर जा बैठा और अपने तेज पंजों से बाघ के सिर को खजाने लगा। बाघ को बड़ा राहत आया और आंखों की पलकें बन्द किए खुर्रद लेने लगा। उसके सिर पर बंदर के पंजों में धीरे धीरे जोर पकड़ा जा रहा है, उसने तेज पंजों से बाघ के खोपड़ी पर आहिसते आहिसते एक छोटा सा छेद बनाया, और पंजे को अन्दर प्रवेश कर बाघ के खोपड़ी का मस्तिक निकाल कर चबाया। भर पेट खाने के बाद बंदर ने बचे हुए कचरा बाघ के आगे पेश कर भेंट किया और कहा,"बाघ दादा, जब आप झपकें ले रहे थे, मैं कहीं कुछ मांस ढूंढ कर लाया है, उसे मुझे खुद खाने की हुड़द नहीं है, तो आप को भेंट कर दूंगा, उम्मीद है कि आप इस छोटी सी भेंट पर असंतुष्ट न हों।"

    बंदर के वाक्य से बहुत ही प्रभावित हो कर बाघ ने कृपा अदा करते हुए कहा,"तुम सचमुच मेरा वफादार सेवक हो, तुम खुद बड़ी भूख लगने पर भी मेरी सेवा करते हो, इस केलिए मैं तुम्हारा आभारी हूं। यह कहते हुए बाघ ने अपना मस्तिष्क गले के अन्दर डाल दिया।"

    दिन पर दिन गुजरता रहा, बाघ के मस्तिष्क को बंदर से खोखला किया जा रहा है। उसके सिर में इतना दर्द शुरू हुई मानो, खोपड़ी अभी ही फट जाए, अभी ही फट जाए। तब जा कर उसे मामुल हो गया है कि वह बंदर के चाल में फंस गया है। वह छपटते हुए बंदर को प्रतिशोध के लिए ढूंढ़ने लगा, किन्तु इस समय बंगर कब ही ऊंचे पेड़ पर चढ़ कर छिप गया। बाघ बड़ी पच्यताप कर कई हुंकार भरकर ज़मीर पर गिर पड़ा और वहीं लुढ़कते लुढ़कते उसकी मृत्यु हो गई।

    "बंदर और बाघ"यानी"नाओ ह लाओहू"(náo hé lǎo hǔ) नाम की नीति कथा को"खुशामद पसंद करने वाला बाघ"के नाम से भी जाना जाता है। इस कथा से यह शिक्षा है कि तुच्छ वालों की मीठी बातों में ना आए, किसी की खुशामदी से दूर रहे। तभी बदनियती से खुद की रक्षा की जा सकती है।

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