इस महान कारनामे से होऊई ने मानव जगत के लिए कल्याण तो किया, पर वह स्वर्ग सम्राट के गुस्से का पात्र बनने से बच नहीं पाया। अपने पुत्रों के मौत से सम्राट घोर आक्रोश में आ गया। उसने होऊई और उसकी पत्नी छांग-अ को देव लोक से निकाल दिया और दोनों को फिर से स्वर्ग लोक वापस लौटने की इजाजत नहीं दी। स्वर्ग वापस न लौटने की वजह से होऊई और छांग-अ ने पृथ्वी लोक में बसने का संकल्प लिया, ताकि धरती पर लोगों की सेवा में ज्यादा हितकारी काम किया जा सके। वे वहां संयासियों जैसा जीवन बिताने लगे। लेकिन वक्त गुजरते-गुजरते होऊई की पत्नी छांग-अ संसार के दुर्भर जीवन से असंतुष्ट हो गई। उसने यह कह कर होऊई की आलोचना की कि उसने स्वर्ग सम्राट के पुत्रों को मारने में समझदारी से काम नहीं लिया।
यह विचार लगातार होऊई को कोसता रहा कि उसके ही कारण उसकी पत्नी छांग-अ को भी स्वर्ग वापस जाने की इजाजत नहीं हैं। उसने सुना कि खुनलुन पर्वत पर रहने वाले देवता सीवांगमु के पास एक दिव्य दवा है, जिसे खाने के बाद मनुष्य स्वर्ग में हमेशा के लिए विराजमान हो जाता है। इसके साथ ही होऊई एक लम्बी दूरी तय करके लाखों मुसीबतों को सहते हुए खुनलुन पहुंचा, और सीवांगमु से दिव्य दवा प्राप्त की। लेकिन यह दवा केवल एक ही व्यक्ति के लिए पर्याप्त थी। होऊई यह कभी नहीं चाहता था कि वह अपनी प्यारी पत्नी को धरती पर छोड़ कर अकेला स्वर्ग चला जाए, लेकिन यह भी नहीं चाहता था कि पत्नी उसे छोड़ कर अकेली स्वर्ग चली जाए। इस दुविधा से परेशान होकर वह घर लौटा और दवा को कहीं किसी कोने में छिपा कर रख दिया।









