
तिब्बती ओपेरा तिब्बती बहुल क्षेत्रों में प्रचलित लोकप्रिय ओपेरा है, जिसके आरंभ के संदर्भ में एक सुन्दर कहानी है । कहा जाता है कि 15वीं शताब्दी में तिब्बती बौद्ध धर्म के गेलुग संप्रदाय के भिक्षु थांगतुंग ज्याल्पू तिब्बती जनता के जीवन को बेहतर सुविधा देने के लिए छिंगहाई तिब्बत पठार में विभिन्न नदियों पर पुलों का निर्माण करना चाहते थे । उन्होंने पुल के निर्माण के लिए पूंजी जुटाई, लेकिन शुरू शुरू में कई सालों तक वे सफल नहीं हुए । बाद में थांगतुंग ज्यालपू ने धार्मिक अनुयायियों में सुन्दर, बुद्धिमान और नाच-गाने में निपुण सात लड़कियों से एक ओपेरा दल की स्थापना की, वे धार्मिक प्रथाओं के विषय पर सरल नाच गान प्रस्तुत करते थे और ओपेरा प्रदर्शन करते थे । उन्होंने इस प्रकार ओपेरा के लिए राशि जुटायी और पुलों का निर्माण किया । यह था तिब्बती ओपेरा का आरंभ । इस तरह लोग थांगतुंग ज्याल्पू को तिब्बती ओपेरा का प्रथम गुरू मानते हैं । और साथ ही पेइचिंग ओपेरा से 400 साल पुराना होने की वजह से तिब्बती ओपेरा को तिब्बती संस्कृति का "जीवित जीवाश्म" माना जाता है।
अंजली









