
चोखान मठ
उसी दिन विमोचन समारोह में इतालवी पत्रिका《अंतरराष्ट्रीय मंच》के प्रमुख संपादक अंद्रिआ फ़ाइस ने बल देते हुए कहा कि समझदार विवाद को राजनीतिक स्तर तक नहीं पहुंचाया जाए। पश्चिमी देशों द्वारा अपनी मज़बूत सॉफ्ट शक्ति के माध्यम से दूसरे देशों के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप करना अस्वीकार्य है। उन्होंने कहा:
"आजकल इस प्रकार वाली भयानक विचारधारा फिर भी मौजूद है। कुछ समय कठोर बहिष्कार से चीन की वास्तिवक स्थिति की अपेक्षा की जाती है। यह सच है कि चीन में अंतरविरोध और मुद्दे मौजूद हैं, लेकिन इस तथ्य से पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता कि तिब्बत का मुद्दा चीन का आंतरिक मामला है। लोगों के विवादित विचारों के अनुसार इसे तूल नहीं देना चाहिए कि चीन अंतरराष्ट्रीय स्थिति में खतरनाक साबित होगा।"
भविष्य के उन्मुख अतीत का सिंहावलोकन करना अनिवार्य है। किताब《तिब्बत : अतीत और भविष्य का चौराहा》के लेखक मार्को कोस्टा ने जानकारी देते हुए कहा कि इटली तिब्बती शास्त्र के अनुसंधान जगत का एक अहम हिस्सा है। इसमें उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल हुई थीं। वर्तमान में इटली में तिब्बत के प्रति समझ बदल रही है। उन्होंने कहा:
"अब अधिक से अधिक इटालवी लोग चीन की यात्रा करने लगे हैं। इनमें से कुछ तिब्बत का दौरा भी करते हैं। इस तरह चीन के तिब्बत स्वायत्त प्रदेश में प्राप्त प्रगति को उन्हें खुद देखा है। यहां मैं कुछ बताना चाहता हुँ कि कुछ हफ्ते पहले पोप ने दलाई लामा के साथ भेंट करने से इंकार कर दिया। देखिए, परिवर्तन सबसे पहले कैथोलिक धर्म जगत में आया। इटली न सिर्फ़ विचारों से, बल्कि वास्तविक कार्रवाई के माध्यम से भी तिब्बत के प्रति समझद बदल रहा है। लोगों को मालूम है कि दलाई लामा सिर्फ़ खुद और निष्कासित सरकार के अलावा किसी और का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। यह दलाई लामा के तिब्बत के एकमात्र प्रतिनिधि वाले कथन की तुलना में बिलकुल ज़मीन-आसमान का फ़र्क मौजूद है।"
(श्याओ थांग)









