अखिल- बिल्कुल सही कहा आपने लिली जी। दोस्तों, मैं आपको एक प्यारी सी कविता सुनाने जा रहा हूं। कविता का शीर्षक है " वक़्त नहीं "
हर ख़ुशी है लोंगों के दामन में,
पर एक हंसी के लिये वक़्त नहीं.
दिन रात दौड़ती दुनिया में,
ज़िन्दगी के लिये ही वक़्त नहीं.
सारे रिश्तों को तो हम मार चुके,
अब उन्हें दफ़नाने का भी वक़्त नहीं ..
सारे नाम मोबाइल में हैं ,
पर दोस्ती के लिये वक़्त नहीं .
गैरों की क्या बात करें ,
जब अपनों के लिये ही वक़्त नहीं.
आखों में है नींद भरी ,
पर सोने का वक़्त नहीं .
दिल है ग़मो से भरा हुआ ,
पर रोने का भी वक़्त नहीं .
पैसों की दौड़ में ऐसे दौड़े,
की थकने का भी वक़्त नहीं .
पराये एहसानों की क्या कद्र करें ,
जब अपने सपनों के लिये ही वक़्त नहीं
तू ही बता ऐ ज़िन्दगी ,
इस ज़िन्दगी का क्या होगा,
की हर पल मरने वालों को ,
जीने के लिये भी वक़्त नहीं....
अखिल- दोस्तों, आपने देखा होगा कि आज के समय में हम social दिखने के चक्कर में Social media के मकड़ज़ाल में इस कद्र उलझ गए हैं कि अपने family से familiar होने का वक्त नहीं या यूं कहूं हम जमीनीं रिश्तों को भूला बैठे है। आज मैं आपको कुछ पंक्तियां सुनाने जा रहा हूं।
आज न जाने क्यूँ मन कुछ उचट सा गया है।
आत्म मंथन की खातिर दिल मचल सा गया है।
सैंकडो मील दूर बैठे whatsapp पर किसी इंसान के Last seen at… की हमें खबर है ,
मगर अपने ही घर के किसी कमरे में बैठे बूढे पिता जी को कब देखा था……याद नहीं।
हमारे बुज़ुर्ग माता-पिता कई बार हमें करीब से निहार कर अपने कमरे में चले जाते है,
और हम अपने स्मार्ट फ़ोन में नजरें गडाए उन्हें नजर अंदाज कर देते है।
हमें मालूम है कि हमारा फलाँ दोस्त इस समय typing.. कर रहा है
मगर ये नहीं पता कि बाज़ू वाले कमरे मे बेटा पढाई कर भी रहा है या नहीं।
हम सुबह उठते ही अपने फोन पर सैंकडो लोगों को Good morning wish करते हैं,
मगर चाय का प्याला देने आई बीवी को आप Thanks कहना भूल जाते है।
🔴पार्क की बैंच पर अपने बीवी बच्चों के साथ बैठ कर ठहाके कब लगाए थे--याद नहीं।
Whatsapp पर joke share कर के तो हम रोज हंसा करते हैं .
बीवी कितना ही अच्छा और ताज़ा खाना परोस दे हम तारीफ़ नही करते
जबकि किसी दोस्त के महीनो पुराने बासी forwarded मैसेज पर हम तुरंत कमैंट कर देते है।
हमें अपने परिजनो के लिए उनकी पसंद की कोई चीज पास की दुकान से लाने में आलस महसूस करते हैं।
जबकि Playstore से कोई app ढूँढने में हम घंटो बिता देते हैं।
आज हमारे पास Virtual friends की विशाल दुनिया है।
जबकि वास्तविक दोस्तो का अभाव है।
हम facebook twitter पर अपने followers या likes को देखकर फूले नहीं समाते
जबकि सच तो ये है कि हमारे खुद के बच्चे तक हमे like या follow नहीं करते।
दोस्तों, हो सकता है ये बातें जरूर हमारे मन को झकझोर दे। एकांत में बैठकर इस पर जरूर गौर करें।
लिली- चलिए दोस्तों... अब हम बढ़ते हमारे हंसगुल्लों की तरफ यानि मजेदार और चटपटे चुटकुले, जहां मिलेंगी हंसी की डबल डोज।
टीचर- नालायक, क्लास में दिन भर लड़कियों के साथ इतनी बातें क्यों करता है?
लड़का- क्या करूं मैडम जी, मैं बहुत गरीब हूं, मेरे मैसेज फ्री नहीं हैं!!
फकीर (संता से) - आपके पड़ोसी ने पेट भर कर खाना खिलाया है, अब आपकी खिलाने की बारी है।
संता - लो, हाजमोला खाओ आराम से।
दोस्तों, हम आपको एक ऐसे टीचर से मिलवाने जा रहे है जो बिना सिर-पैर के बच्चों को पढ़ाता है। आइए.. सुनिए यह ख़ास ओडियो...









